ये है परमात्मा को पाने का सबसे आसान रास्ता: सतगुरु

Radha Soami- सतगुरु के अनुसार परमात्मा अपने अंतर है। उसको प्राप्त करना है तो अंतर में झांकना होगा, हमें बाहर नहीं भटकना। बाहर भटकने से हम अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं। हम अपने मंजिल से कहीं दूर जा रहे। इसलिए किसी गुरु की शरण में जाइए और रूहानियत का मार्ग अपनाइये

राधास्वामी

सतगुरु के अनुसार हमें जो मिलेगा, अंतर में मिलेगा।

अगर हम यह मानते हैं कि परमात्मा हमारे अंदर में है, तो फिर उसे बाहर ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है। मूर्ति पूजा की कोई जरूरत नहीं है, तस्वीरों को माथा टेकने या ग्रंथों से ज्ञान हासिल करने की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि युगो-युगो से संत-महात्मा यही कहते आए हैं कि हमें जो भी मिलेगा, अपने अंतर नहीं मिलेगा।

अपनी आत्मा को सबसे ऊंचें मंडलों तक ले जाने के लिए हमें उस कुलमालिक को अपने अंदर ही ढूंढना होगा। हम जो कुछ भी हम ढूंढना चाहते हैं, वह सब हमारे अंतर में है। परमात्मा का सफर ठीक वैसा ही है जैसे की एक बीज का विकास होता है। उसी परमार्थ में भी हमें भजन-सिमरन का बीज बोना है। फिर पूरी लगन और सब्र से उसकी परवरिश करनी है, तभी हमें अपनी कोशिशों के नतीजे का निजी अनुभव होगा। बीज के विकास का सिलसिला जमीन की गहराई में शुरू होता है और परमार्थ के बीज का विकास आत्मा की गहराई में होता है। वृक्ष जितना ऊंचा होता है, उसकी जडें भी जमीन में उतनी ही गहरी होती है।

बाबाजी

आत्मा की गहराई में जाना है तो सुमिरन करें

सन्तों के अनुसार परमार्थ में तरक्की करने के लिए, ऊँचे आत्मिक मंडलों तक पहुंचने के लिए हमें अपनी आत्मा की गहराई तक पहुंचना होगा। अपनी चेतना के लिए हमें अपने अंतर की गहराइयों में भजन-सुमिरन का बीज बोना होगा। हमें ज्यादा से ज्यादा, बिना नागा भजन-सुमिरन करना होगा।

जब कोई बीमार आदमी अपना इलाज करवाने के लिए डॉक्टर के पास जाता है तो उसकी बीमारी को दूर करने के लिए उसे दवा दी जाती है। उसी तरह हमारे डॉक्टर है सतगुरु, बीमारी है कुलमालिक से जुदाई, और दवा है भजन-सुमिरन। हमें कुलमालिक से जुदाई को दूर करने के लिए भजन-सुमिरन की दवा लेने की जरूरत है। पहले हम धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हैं। जब तक कि हमें किसी निजी अनुभव नहीं हो जाता।

हर एक कदम हमारा हौसला बढ़ाता है

उदाहरण के लिए जब बच्चा पहले दिन स्कूल जाता है तो वह हिचकिचाता है, परेशान दिखाई देता है। स्कूल की इमारत से, अध्यापक से और दूसरे बच्चों से उसे डर लगता है। लेकिन अगले दिन इतना डर नहीं लगता और फिर जैसे-जैसे दिन, महीने बीतते जाते हैं वह बिना किसी झिझक के स्कूल जाने लगता है। क्योंकि तब उसे स्कूल की इमारत बेगानी नहीं लगती, अध्यापक और दूसरे बच्चों से भी जान पहचान हो जाति है। उसका फिर धीरे-धीरे हौसला बढ़ जाता है।

रूहानी और सतगुरु को लेकर भी हमारे साथ कुछ ऐसा ही होता है। शुरू-शुरू में हमें डर लगता है क्योंकि यह धारणा हमारे लिए नई होती है, बल्कि हमें यह अजीब और अनोखी-सी लगती है। हम इसके बारे में और ज्यादा जानने के लिए उतावले होते हैं, लेकिन पहला कदम उठाने के लिए झिझकते हैं। हमारे सवाल परमात्मा से मिलाप कि हमारी इच्छा तो जाहिर करते हैं। लेकिन उस दिशा में बढ़ना हमें मुश्किल लगता है। लेकिन अगर एक बार हमें साफ-साफ समझ आ जाए कि हमें किसकी तलाश है और उस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन कौन-सा है, तो फिर धीरे-धीरे हमारा डर दूर होने लगता है और हम उस परमात्मा से मिला के लिए बेचैन होने लगते हैं।

आओ, गुरु के हुकुम की पालना करें।

हमें सतगुरु के हुक्म के अनुसार भक्ति परमात्मा की करनी चाहिए। उनके बताए गए रास्ते पर चलना चाहिए। उन्होंने जो उदाहरण हमें आज समझाएं हैं उस पर विचार जरूर करना चाहिए। हमें रूहानियत के मार्ग पर चलते हुए कभी डरना नहीं चाहिए। रूहानियत कमाल तो बिल्कुल आसान और सच्चा है। हमें गुरु से प्राप्त नामदान कि युक्ति को कभी भूलना नहीं चाहिए, हमें हर रोज बिना नागा भजन-सुमिरन करना चाहिए ताकि हम भी अपने असल काम में सफलता प्राप्त करें।

।।राधास्वामी।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *