यही जीव हैं जो दूसरों के भले की सोचते हैं: बाबाजी


Radha soami – जो जीव उस एक परमात्मा का सिमरन करता है वो अपने अहंकार पर विजय प्राप्त कर लेता है। परमेश्‍वर का सिमरन करते रहने से किसी ओर पर निभ॔र नही होना पड़ता। परमात्मा का सिमरन करने वाले जीव हमेशा दुसरों का भला चाहते है। प्रभु का सिमरन करने वाला प्रभु-परमात्मा के निकट वती॔ हो जाता है।

सिमरन की साधना अपने आप करने से नही होती। इसमें वही जीव रुचि लेते है जिनका मन प्रभु खुद इस की ओर मोडे, सिमरन करने वालों के चहरों पर हमेशा सुन्दरता झलकती है।

मैं कमली मेरा सतगुरु सोहना

सतगुरु ही परमात्मा का रूप

हमें सतगुरु का रास्ता अपना चाहिए। सतगुरु के हुक्म अनुसार हमें चलना चाहिए। सतगुरु एक रूहानी मार्गदर्शक यानी आदर्श हैं। उनका कार्य है परमार्थ की खोजियों को सांसारिक बंधनों से छुड़ाकर रूहानियत के परम लक्ष्य तक ले जाना। सतगुरु सर्वोच्च हैं, सर्व व्यापक हैं और सब कुछ उनमें समाया हुआ है। वहीं केंद्र बिंदु हैं, मध्य बिंदु हैं और आधार बिंदु हैं। सतगुरु सृष्टि का रहस्य जानने की कुंजी हैं। सारा ब्रह्मांड उन्हीं में समाया हुआ है।

शब्द स्वरूप

जो सतगुरु के शब्द स्वरूप से जुड़ गए हैं, जिन्होंने उनका नूरी स्वरूप देखा है, जिन्हें आंतरिक अनुभव हो चुका है, वे जानते हैं कि सतगुरु और परमात्मा के बीच कोई भेद नहीं है। उनके लिए सतगुरु और परमात्मा एक ही हैं। अलग नहीं हैं, वह परमात्मा का हिस्सा हैं। दोनों एक ही शब्द, एक ही तेज, एक की शक्ति और एक चेतनाना हैं, ठीक उसी तरह जैसे सूरज और उसकी किरण।

परमात्मा का अहसास अनुभव से

हमें निजी अनुभव से यह एहसास हो जाता है कि हमारे लिए पहले सच्चाई सतगुरु हैं, उसके बाद परमात्मा। सतगुरु नहीं तो परमात्मा भी नहीं। इसलिए हमें हमेशा सतगुरु के हुक्म में चलना है। सतगुरु द्वारा दिए गए नामदान पर अमल करना है। उसका सिमरन करना है।

बाबा गुरविंदर सिंह जी

बाबाजी बताते हैं: भले ही हजारों सूर्यों का प्रकाश हो जाए, लेकिन रूहानी मार्ग में सतगुरु के बिना हम अज्ञानता और अंधकार में है। बिना सतगुरु की मुक्ति कभी नहीं मिल सकती।

सतगुरु का कार्य उपदेश की याद दिलाना

सतगुरु का कार्य है हमें उपदेश की याद दिलाना और भजन-सिमरन द्वारा हमारा ध्यान उस परम ज्ञान की ओर, उसकी पहचान की ओर ले जाना जो रूहानियत का मूल स्रोत है, क्योंकि भजन-सिमरन ही हमारी आंतरिक अभ्यास की बुनियाद है। सतगुरु हमें वह युक्ति बताते हैं जिससे शिष्य की आत्मा एकता होकर अंतर में जुड़ जाती है। वह हमें सिखाते हैं कि कैसे मन को एकाग्र करके सतगुरु के स्वरूप पर ध्यान टीकाना है।

संतों का उपदेश बिल्कुल सीधा-साधा

सतगुरु का उपदेश बिल्कुल सीधा-साधा है। भजन-सिमरन द्वारा परमात्मा से मिलाप करना। नामदान के समय हमें मुक्ति प्राप्त करने का साधन बताया जाता है जो हमें जन्म-मरण से छुटकारा दिला सकता है।

यह हम पर निर्भर है कि हम इसे कितना आसान या मुश्किल बना लेते हैं। अगर सतगुरु द्वारा बताए गए तरीके के मुताबिक भजन करते हैं तो बहुत ही आसान है। जिसके द्वारा अपने निजधाम पहुंच सकते हैं। इस चौरासी के जेलखाने से छुटकारा पाकर हम अपने परम पिता परमात्मा में समा सकते हैं।

आइए भजन-सिमरन पर जोर दें।

हमें बाबाजी के हुक्म के अनुसार ज्यादा से ज्यादा समय भजन-सिमरन करें। जितना भजन-सिमरन करेंगे उतना हम परमात्मा के नजदीक होंगे। यही अवसर है जिसके द्वारा यह उत्तम कार्य हो सकता है। क्योंकि मनुष्य जन्म ही ऐसा आधार है, जिसमें बैठकर भजन-सिमरन किया जा सकता है। उस परमपिता परमात्मा को पाया जा सकता है। तो आइए इस अवसर का लाभ उठाते हुए परमात्मा को प्राप्त करें।

।।राधास्वामी।।

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