उसकी रजा में रहने से ही मन समर्पण करना सीखता है: बाबाजी

Radha soami – संत महात्मा अपनी रहमत कब हम पर कर दें? हमें कुछ नहीं पता। हमें तो बस समर्पण की भावना सीखनी है। संत बातों ही बातों में हमारे सभी बुरे कर्मों का बोझ उतार सकते हैं और एक रूहानियत पर चलने वाली राह को आसान कर देते हैं। हम नहीं जानते, कब संत हमारे इस चौरासी के जाल को खत्म कर दे और कब हमें अपने परमात्मा के दर्शन करा दे? इसलिए हमें उसकी रजा में राजी रहना चाहिए, उसके हुकुम के अनुसार चलना चाहिए।

बाबाजी से सवाल जवाब

ये शब्द रूहानी उपदेश का निचोड़

संत महात्माओं सीधे-साधे शब्दों का मतलब हमारी समझ से कहीं पर है। यह कोई मुहावरा नहीं है। हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि ये शब्द रूहानी उपदेश का निचोड़ है। उसकी रजा समझना और फिर उसकी रजा में रहना ही शिष्य बनना है। शिष्य बनने का मतलब है अनुशासन में रहना। अनुशासन का मतलब है हुकुम में रहना। हुकुम में रहने का मतलब है समर्पण और समर्पण का मतलब है उसकी रजा में रहना। समर्पण ऐसी व्यवस्था है जो एक पापी को भी संत बना सकती है, क्योंकि समर्पण या उसकी रजा में रहना ही अन्तज्ञान हासिल करना है।

बाबाजी

मुल्ला नसीरुद्दीन से कहा

किसी नेक इंसान ने मुल्ला नसीरुद्दीन से कहा, “अल्लाह की मर्जी पूरी हो।”

मुल्ला नसीरुद्दीन बोले, “हर हाल में हमेशा ऐसा ही होता है।”

उसने पूछा, “मुल्ला, तुम यह कैसे साबित कर सकते हो?”

मुल्ला नसीरुद्दीन ने जवाब दिया, “बड़े आराम से! अगर हमेशा सब कुछ उसकी मर्जी से न होता तो यकीनन किसी न किसी वक्त मेरी मर्जी से भी कुछ होता। है ना?”

सत्य का अनुभव आंतरिक अनुभव से

कहा जाता है: “समर्पण करना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है खासकर जब इसकी कोशिश की जा रही होती है, लेकिन जब यह हो जाता है तो सबसे आसान लगता है।” समर्पण ऐसी व्यवस्था है जब मन में कोई सवाल नहीं उठता और मन को संपूर्ण विश्वास हो जाता है। सतगुरु समर्पण की मांग नहीं करते, यह तो शिष्य की भक्ति का कुदरती नतीजा है।

समर्पण की राह में सबसे बड़ी रुकावट हमारा तथाकथित ज्ञान और हमारी अक्ल है। जिसमें धारणाऐं, लफ्ज़, मान्यताएं, धर्म सिद्धांत आदि शामिल हैं। हम इस इधर-उधर से ज्ञान बटोर कर ज्ञानी बन जाते हैं, लेकिन जो लोग सत्य की खोज में है उनके लिए ज्ञान एक बहुत बड़ी रुकावट बन जाता है। जब हम बाहरी ज्ञान और विद्या से ऊपर उठकर अपने मन को खाली करते हैं, तभी हमें सत्य का अनुभव होता हो सकता है। यह सत्य आंतरिक अनुभव से मिलता है। केवल उसी स्तर पर पहुंचकर हम दावा कर सकते हैं कि हम जानते हैं।

गौतम बुद्ध का खूबसूरत क़िस्सा

गौतम बुद्ध की शिक्षा पद्धति के बारे में खूबसूरत क़िस्सा है: महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को नदी से पानी लाने के लिए कहा। नदी में गंदा पानी बह रहा था। आनंद ने सोचा यह पानी के पीने लायक नहीं है, इसलिए वह बिना पानी के लिए आ गया। गुरु ने उसे फिर से पानी लेने भेज दिया। आनंद सोचने लगा कि गुरु उसे बार-बार पानी लाने के लिए क्यों भेज रहे हैं जबकि वह बता चुका है कि पानी गंदा है? इसलिए वह फिर से बगैर पानी लिए आ गया।

महात्मा बुद्ध ने उसे तीसरी बार भेजा। इस बार आनंद ने सोचा कि वह पानी के स्थिर होने का इंतजार करेगा। वह नदी के किनारे कुछ घंटे इस इंतजार में बैठा रहा की मिट्टी पानी की सतह में बैठ जाए ताकि पानी साफ और गुरु के पीने लायक हो जाए।

वहाँ चुपचाप बैठे वह समझ गया कि गुरु उसे क्या सीख दे रहे हैं। वह जान गया कि गुरु उसे यह शिक्षा दे रहे थे कि नदी हमारे मन के समान है। हमें धैर्य से इंतजार करने की जरूरत है, गौर से अपने मन की निगरानी करने की जरूरत है। मन को शांत होने दो और धीरे-धीरे सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। जब मन में हलचल नहीं रहती तब वह शान्त अवस्था में पहुंच जाता है, जागृत हो जाता है और मन समर्पण करता है।

आओ, विचार करें

आओ हम सब इन महात्माओं की शिक्षा पर अमल करें और उनके बताए हुए रास्ते पर चलें। उनकी रजा में राजी रहते हुए भजन सुमिरन करें। सब से प्रेम करें, सेवा करें और अपने परमात्मा प्राप्ति के रास्ते पर चलें।

।।राधास्वामी।।

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