उद्धृत पुस्तकों एवं लेखकों का संक्षिप्त परिचय इन शब्दों में: जिज्ञासु

Radha soami – सभी सन्तों का एक ही संदेश रहा है। परमात्मा को केवल भजन-सिमरन के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने बहुत सारी पुस्तकें लिखी है जिसमें केवल उन्ही शब्दों का अर्थ बताया गया है और भजन सुमिरन पर जोर दिया गया है। हम उनके द्वारा लिखित कुछ उद्धृत पुस्तकों की जानकारी प्राप्त करेंगे।

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बाबा जैमल सिंह जी

बाबा जैमल सिंह जी (1839-1903) बाबा जी महाराज के नाम से प्रसिद्ध, बाबा जैमल सिंह जी का जन्म पंजाब के घुमान गांव में किसान परिवार में हुआ था। आपको नामदान की बख्शीश आगरा के परम संत स्वामी जी महाराज से हुई और उन्होंने ही आपको पंजाब में संतमत का प्रचार करने का आदेश दिया।

सेना की नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद निर्विघ्न भजन- सुमिरन करने के लिए आपने व्यास नदी के पश्चिमी तट के एकांत स्थान को चुना, जहां जल्दी ही आपके पास जिज्ञासु आना शुरू हो गए और इस प्रकार है नियमित सत्संगों का सिलसिला शुरू हो गया। 1903 में ज्योति-ज्योत समाने से कई महीने पूर्व आपने महाराज सावन सिंह जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। महाराज सावन सिंह जी ने ही अपने सतगुरु की याद में इस स्थान का नाम डेरा बाबा जैमल सिंह रखा। बाबा जी महाराज द्वारा महाराज सावन सिंह जी को लिखे हुए पत्र को प्रमाण पत्र भाग-1 नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है।

गुरु अर्जुन देव जी का जीवन

संत गुरु अर्जुन देव जी (1563-1606): आप गुरु नानक साहिब की गद्दी के पांचवी गुरु थे। आपने अत्यंत प्रयास करके गुरु साहिबान की वाणीयां एकत्रित की, उनका वर्गीकरण किया और उन्हें आदि ग्रंथ में संकलित किया। आपने भारतीय उप-महाद्वीप के कई अन्य महात्माओं की वाणीयां भी इसमें सम्मिलित कीं, जिनकी शिक्षाएं एक परमात्मा में आस्था, शब्द साधना का मार्ग, सामाजिक समानता और सत्य की खोज पर बल देती थी।

गुरु नानक देव जी

नानक देव जी (1469-1539) गुरु नानक देव जी का जन्म लाहौर के निकट तलवंडी नामक स्थान (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ। आपने जीवन का एक बड़ा भाग भ्रमण करने और शब्द या नाम के साथ अभ्यास की शिक्षा का प्रचार करने में गुजारा। इस भ्रमण को ‘उदासियां’ कहा जाता है।

आपने इन उदासियों में शब्द या नाम के अभ्यास की शिक्षा का प्रचार किया। आप गुरु नानक की गद्दी के दस गुरुओं की पीढी के पहले गुरु थे जिनकी वाणी आदि ग्रंथ में दर्ज है जो कि सिक्खों का पवित्र ग्रंथ है। आपने लोगों को उनके पूर्वाग्रहों और अंधविश्वासों से मुक्त करने का प्रयास किया और समझाया कि बाहरी पूजा कर्मकांड सत्य की पहचान में सहायता नहीं करते।

आओ सुमिरन करें।

हमें भी इन सभी संतो के द्वारा लिखे गए ग्रंथों पर अमल करते हुए, उन्होंने जो हमें शिक्षाएं दी है हमें गुरु से प्राप्त नामदान पर अमल करना है। भजन-सुमिरन करना है। अपने ध्यान को तीसरे तिल पर एकाग्र करना है और अपने परमात्मा को प्राप्त करना है।

।।राधास्वामी।।

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