सुमिरन करने का आसान तरीका क्या है? बाबाजी ने बताया: जानें।

Radha Soami Satsang Beas – बाबाजी अपने एक सत्संग में फरमाते हैं कि आप भजन आरंभ करने से पहले पंद्रह मिनट तक गुरु के स्वरुप का ध्यान किया करें। फिर सुमिरन आरंभ करें और यदि अंतर में गुरु का स्वरूप या कोई तारा दिखाई दे तो उसी पर ध्यान टिका है। यदि कुछ भी दिखाई ना दे तो अंतर में अंधकार को देखते हुए ही सिमरन करते रहना चाहिए। अपने ध्यान को एकत्रित करना चाहिए।

जब अंतर में द्वार खुले तो सुमिरन न छोड़ें, ध्यान तीसरे तिल पर रखें।

बाबा जी फरमाते हैं जब द्वार खुलना शुरू होता है तो अंतर में कई प्रकार की दृश्य दिखाई देते हैं। परिणाम यह होता है कि अभ्यासी सुमिरन को छोड़कर दृश्य देखने लग जाता है। यह गलत है। जब कोई दृश्य अथवा रूप दिखाई दें, तब न तो सुमिरन छोड़ना चाहिए और न ही अपने ध्यान को तीसरे तिल पर से हटने देना चाहिए। तभी शरीर पूर्णतया खाली होगा और अभ्यासी अंतर में टिक सकेगा। तभी असल स्वरूप के दर्शन हो सकेंगे।

शरीर की ओर ध्यान ना दें, एकाग्रता बनायें रखें।

सूरत को बाहर के पदार्थों से हटाकर अंतर में लगाना जरूरी है। प्रसन्नता की अनुभूति एकाग्रता का चिन्ह है, परंतु शरीर स्थिर होना चाहिए। सारा ध्यान और चेतन शक्ति का रुख तीसरे तिल की ओर होना चाहिए। शरीर की ओर ध्यान न दें। अगर कोई गति( हिल डुल) हो तो उसे न होने दें। आप फरमाते हैं कि वह अभ्यासी बड़ा भाग्यशाली है, जिनको अंतर में गुरु के स्वरूप की झलक दिखाई देती है। जब आप सुरत को अधिक दृढ़ता से टीका पाएंगे, तो आप अंतर में गुरु के अधिक से अधिक स्पष्ट तथा पूरे दर्शन कर सकेंगे।

आओ: अमल करें इन वचनों पर और सुमिरन पर ज़ोर दें।

तो हमें बाबाजी के इन वचनों पर अमल करते हुए अपने ध्यान को तीसरे तिल पर टीका ना है और ज्यादा से ज्यादा सुमिरन करते हुए हमें वह लक्ष्य हासिल करना है। हमें अपने शरीर को एकाग्र करना है। मन को एकाग्र करना है। और लगातार भजन-सिमरन करते रहना है, ताकि हम अपने मनुष्य जन्म का लाभ उठा सकें। ज्यादा से ज्यादा हमें भजन सिमरन करना है जी।

राधास्वामी

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