शिष्य के विश्वास पर गुरु भी नतमस्तक हो जाते हैं कैसे? जानें।

Radha soami- अपने सतगुरु पर विश्वास रखना और उस विश्वास पर बने रहना, आपके जीवन में बहुत महत्व रखता है। सुना है जिसने भी परमात्मा पर विश्वास बना कर रखा है, उसका जीवन सफल हो गया है। उसका चौरासी जेलखाने से आवागमन का चक्कर खत्म हो गया है। इसलिए हमें आपने मुर्शिद, अल्लाह पर विश्वास बहुत जरूरी है। विश्वास पर उदाहरण दिया है। जिसको जानना बहुत आवश्यक है।

Guru di bakshish

विश्वास और सत्य एक

विश्वास और सत्य एक ही है। परमात्मा के नजरिए से यह सत्य है और हमारे नजरिए से विश्वास।

हजरत निजामुद्दीन औलिया का एक किस्सा जो बहुत चर्चित है। उनके बाइस शिष्य हुआ करते थे और हर शिष्य उनका वारिस बनना चाहता था। यह देखने के लिए कि उनमें सबसे सच्चा भक्त कौन है, हजरत निजामुद्दीन ने उनका इम्तिहान देने का फैसला किया।

हजरत निजामुद्दीन औलिया एक बार बाजार में घूमते हुए, उस इलाके में चले गए जहां वेश्याओं के कोठे थे। सभी देखने वालों को हैरानी में डालते हुए हजरत निजामुद्दीन वेश्याओं के कोठे के अंदर चले गए और अपने शिष्यों से बाहर ठहरने के लिए कहा। सभी शिष्य हक्के बक्के रह गए और सोचने लगी कि उनके मुर्शिद हजरत निजामुद्दीन ऐसी जगह पर क्या कर रहे हैं।

जब शिष्य ये देखकर हुए हैरान

शिष्य ये सब देखकर हैरान रह गए और एक-दूसरे से उस पर विचार विमर्श करने लगे और फिर वही खड़े होकर हजरत निजामुद्दीन के आने का इंतजार करते रहे

हजरत निजामुद्दीन ने वहां की मालकिन से कहा कि उन्हें एक रात के लिए कमरा चाहिए और उनके लिए थोड़ा भोजन और उनके लिए थोड़ा शरबत भी भेज दिया जाये। ये सब सुनकर मकान मालिकीन भी हैरान हो गई और उनकी ओर देखने लगी। फिर दोबारा से हजरत निजामुद्दीन ने कहा कि मुझे रात के लिए कमरा चाहिए।

शिष्य बाहर से देख रहे थे कि उनके मुर्शीद के कमरे में खाने पीने का सामान ले जाया जा रहा है। उनके मन में बुरे ख्याल आने लगे और उसे बड़े निराश हो गए। वह सोचने लगे कि उनके मुर्शिद खाने-पीने और वैश्य के पास जाने जैसी हरकतें करके उनका विश्वास कैसे तोड़ सकते हैं? जैसे-जैसे रात बीतती गई, एक-एक करके उनके शिष्य उचाट होकर वापस जाने लगे।

मेरा ठिकाना आपके चरणों में

सुबह होने पर जब हजरत निजामुद्दीन औलिया नीचे आए तो वहां सिर्फ एक ही शिष्य उनका इंतजार कर रहा था। बाकी शिष्य सभी से वहां से परेशान होकर चले गए थे। जब मुर्शिद ने उससे पूछा कि वह भी दूसरों की तरह चला क्यों नहीं गया तो शिष्य ने बड़ी विनम्रता से जवाब दिया, “मुर्शिद, मेरा ठिकाना तो आपके चरणों में है।”

केवल एक ही शिष्य का गुरु में विश्वास डाँवाडोल नहीं हुआ, केवल उसी को अपने मुर्शिद पर पूरा भरोसा था। वह शिष्य था अमीर खुसरो, जिनके कलाम में अपने मुर्शिद हजरत निजामुद्दीन औलिया के प्रति प्रेम ही प्रेम भरा है। उनके कलाम के कारण हम आज भी उन्हें याद करते हैं, क्योंकि उन्हें उन पर पूरा विश्वास था। क्या अपने मुर्शिद पर हमें विश्वास है या नहीं?

।।राधास्वामी।।

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