शरीर जीवित परमात्मा का मंदिर, इसमें है ये खास राज़

Radha Soami Satsang Beas- बाबाजी अक्सर अपने सत्संग में फरमाते हैं कि हमारा शरीर जीवित परमात्मा का मंदिर है। इसे मांस, अंडे, शराब आदि के इस्तेमाल से कभी भी नापाक नहीं करना चाहिए और ना ही इसे झूठ, काम, क्रोध, लोभ, घमंड, अहंकार और सांसारिक मोह-ममता के प्रभाव में बहने देना चाहिए। इस गंदगी को बुहारकर इस मंदिर को मालिक के रहने के लायक बनाना चाहिए। इसे साफ-सुथरा रखना चाहिए।

परमार्थ में तरक्की के लिए निर्मल और पाक होना जरुरी

निर्मल और पाक दिल परमार्थ में तरक्की के लिए बहुत जरूरी है। एक बादशाह से गंदी कोठरी में आने की उम्मीद नहीं की जा सकती। जब कुत्ता किसी गंदी जगह पर नहीं बैठता, तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार कि मैल से भरे दिल में परमात्मा की आने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

सिमरन से होता है संकल्प शक्ति का विकास

अपने मन को हमेशा सुमिरन में लगाए रखो। क्या इसमें कुछ खर्च होता है? हर समय नाम का सुमिरन करते रहो, जैसे छोटी बच्चे एक, दो,तीन, चार दोहराते रहते हैं। सुमिरन एक बहुत बड़ी ताकत है। सिर्फ सुमिरन से ही हमारे अंदर संकल्प शक्ति का विकास हो सकता है। सुमिरन धीरज और दृढ़ता के साथ बिना रुके करते रहना चाहिए। यह लगातार बिना रुके अटूट रूप से निरंतर कर चलता रहना चाहिए।

आईये सिमरन पर करें विचार

बाबाजी हर सत्संग में भजन-सिमरन पर बहुत जोर देते हैं। क्योंकि यही आखरी वक्त है। मनुष्य शरीर ही एक ऐसा चोला है, जिस में बैठकर हम उस परमपिता परमात्मा की भक्ति कर सकते हैं। अगर यह मौका हाथ से चूक गया तो, पता नहीं कब हमें मनुष्य जन्म प्राप्त होगा। होगा भी या नहीं होगा। यह कोई नहीं जानता। इसलिए आइए; हम सब ज्यादा से ज्यादा भजन-सिमरन करें और अपने लक्ष्य को सामने रखते हुए नामदान की युक्ति पर अमल करें।

।। राधास्वामी ।।

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