सेवादार के लिए ओहदे या पदवियाँ नही, नम्रता से सेवा जरूरी: बाबाजी

Radha Soami- सतगुरु ने हमे सेवादार बना कर सभी जीवों का आदर करना सिखाता है। सतगुरु ने हमारे सामने बहुत ऊंचा आदर्श रखा है और यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए: अच्छे इंसान बनें, सभी को एक समान समझे और बिना कोई उम्मीद रखें, अहंकार और घमंड को छोड़कर सेवा करें। अपने सतगुरु के हुकुम की पालना करें। उनके बताए गए हुकुम अनुसार सेवा करें, सब से प्रेम करें।

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हर किसी को यही रोग, ओहदे और पदवियों की धुन सवार

यह मामला थोड़ा पेचीदा पर है! डेरे के सेवादारों को डेरे की चारदीवारी में रहने से ही आंतरिक की ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती और न ही वे दूसरों से बेहतर या श्रेष्ठ हैं। वे हम सब की तरह आप लोग हैं। कभी न खत्म होने वाली बीमारी जो छूत की तरह हर जगह सेवादारों में फैल जाती है, वह है अपने आप को महत्व देना। हर किसी को यही रोग है। हमें ओहदे और पदवियाँ पाने इतनी धुन सवार हो जाती है कि अगर किसी को कोई ओहदा नहीं मिलता है तो वह सेवा तक छोड़ने को तैयार हो जाता है।

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ओहदे तो इंतजाम की देखभाल के लिए दिए जाते हैं, ना कि अहंकार बढ़ाने के लिए। इन ओहदों के साथ कुछ जिम्मेदारियां भी दी जाती हैं। लेकिन इनको अपने अधिकार मानकर दूसरों पर धौंस जमाने से और लोगों पर दबाव डालने से सेवा में बहुत नुकसान होता है। किसी सेवादार के ओहदे या पदवी से आखिर कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई भी संस्था लोगों के आपसी सहयोग से ही चलती है। असल में काम तो निचले स्तर के सेवादारों की वजह से ही सही ढंग से चलता है।

मन मे अहंकार तो सेवा का मक़सद ख़त्म

मन में अहंकार लेकर सेवा करने से तो सेवा का मकसद ही खत्म हो जाता है। इतने विशाल संगठन में एक सेवादार तिनके के बराबर है। यहां हमारी मौजूदगी की कोई मायने नहीं है, हमारे होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारी कोई अहमियत नहीं है और न ही हमारी गैरहाजरी से सेवा रूकती है।

बाबा गुरविंदर सिंह जी

आओ जरा गहराई से सोच विचार करें: हम आरामदायक दफ्तरों में बैठते हैं जहां एयर कंडीशनर या हिटर लगे होते हैं और यह सोचते तक नहीं सोचते कि जो लोग कडी धूप या कड़ाके की ठंड में काम करते हैं उनका क्या हाल होता होगा। फिर भी हम शिकायत करने की हिम्मत करते हैं। हम बड़े-बड़े घरों में रहते हैं और उन लोगों के बारे में सोचते तक नहीं जो शैड में जमीन पर सोते हैं। फिर भी हम संतुष्ट नहीं हैं। डेरे में हमें हर चीज कम कीमत पर मिलती है फिर भी हम हमेशा और ज्यादा पाना चाहते हैं। हमारी इच्छाओं का कोई अंत नहीं है।

दुनियावी परेशानियों से ध्यान हटाओ, विनम्रता से सेवा करें

हम सब अच्छे वातावरण में ऐसी जिंदगी बिता रहे हैं जिसकी संस्थान में कोई तुलना नहीं की जा सकती है- फिर भी हमें इस की कदर नहीं है। हम देखते हैं कि जगह-जगह से ट्रक भर-भर कर सेवादार आते हैं वे चुपचाप आते हैं और अपनी सेवा करके उसी तरह वापस चले जाते हैं। बिना कोई शोर-शराबा करते हैं, ना कोई वाह-वाही चाहते हैं। हमें भी ऐसा ही रवैया अपनाने की जरूरत है। रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली परेशानियों से ध्यान हटाकर पूरी विनम्रता से सेवा करनी चाहिए। यहां एक आदर्श माहौल है जहां ओहदे और पदवियों की अहमियत नहीं है। जहाँ रुतबे और दुनियावी तरक्की कोई मायने नहीं रखती, यहां हमारी इंसानियत का महत्व है, प्रेम और श्रद्धा से हुक़्म मानते हुए हुए निस्वार्थ भाव से सेवा करने का महत्व है।

हम अपने आपको बदलें, दुनिया में फंसे रहने के बजाय रूहानी तरक्की करें! आखिरकार एक ही सवाल सामने आता है- हम कौन हैं? जैसे की बाइबिल में कहा गया है: “तुम मिट्टी हो और मिट्टी में ही मिल जाओगे।” हमें सतगुरु ने जो रूहानियत का रास्ता बताया हैं, हमें उस पर चलते हुए सतगुरु से नामदान की युक्ति प्राप्त करनी है और सेवा भावना रखते हुए उस पर अमल करना है। भजन-सुमिरन करना है, वह प्रभु को प्राप्त करना है।

।।राधास्वामी।।

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