संतमत अथवा गुरुमत के बारे में जानकर हो जाओगे हैरान: संतजन

Radha Soami : बाबाजी समझाते हैं कि जब हम किसी सत्संग अथवा किसी संस्था या किसी संघ से जुड़ते हैं तो हमें संसार और गुरुमत के बारे में कुछ समझ आता है। हम फिर उन पर विचार करते हैं कि गुरुमत का अर्थ क्या होता है? संतमत का मतलब क्या होता है? हमारे अंदर शब्दों को जानने की और जिज्ञासा बढ़ती हैं। इन शब्दों का अर्थ हमें किसी सच्चे गुरु की शरण में जाने से ही मिल सकता है।

मनमत और संतमत का अर्थ

संसार में हमारे सामने दो मार्ग हैं। हम लोग या तो अपने मन के कहे अनुसार चल सकते हैं जिसे मनमत कहा जाता है, या पूर्ण गुरु के उपदेश पर चल कर प्रभु को प्राप्त करने का यत्न कर सकते हैं जिसे गुरूमत अथवा संतमत कहा जाता है। हर जीव अपनी बुद्धि के अनुसार यही समझता है कि वह गुरु मत पर चल रहा है।

सिख भाई पांच ककार – कच्छा, कड़ा, कृपाण, कंघा और केश- रखकर यह दावा करते हैं कि वे गुरमत पर चल रहे हैं। उनमें यह पांच ककार परम आवश्यक माने जाते हैं और कोई भी व्यक्ति इनके बिना ‘गुरु का सिक्ख’ नहीं कर सकता।

मुसलमानों का गुरमत- पांच समय की नमाज़, रमजान के महीने में सुबह से शाम तक तीस दिन के रोजे, मक्के का हाज तथा ‘ज़कात’ (आय का कुछ भाग दान में देना) -पर आधारित है।

इसी प्रकार हिंदू शिखा, सूत्र, संध्या हवन तथा कर्मों को गुरमत समझते हैं। कुछ लोग मूर्तिपूजा, तीर्थस्थान तथा पवित्र नदियों व सरोवर में स्नान करना ही गुरमत मानते हैं। कुछ इसलिए अपने को गुरमत के अनुयायी समझते हैं, क्योंकि वे गीता, रामायण आदि धार्मिक ग्रंथों का पाठ या गायत्री मंत्र आदि का जाप करते हैं। इस कुछ लोग हठकर्मों को परमात्मा प्राप्ति का साधन मानते हैं।

सच्चा गुरमत आखिर क्या है?

सब लोग किसी ने किसी परिपाटी के पीछे चलते हुए अपने आपको गुरुमत के अनुयायी मानते हैं। परंतु विचार करने की आवश्यकता है कि सच्चा गुरमत आखिर क्या है? परमार्थ का सिद्धांत है कि शिष्य गुरु के ज्ञान तथा सामर्थ्य के अनुसार ही तरक्की करता है। परंतु हमें पग-पग पर कई गुरु मिलते हैं। सत्य तो यह है कि संसार में गुरु कहलाने वाले अधिक है तथा शिष्य कम है।

कबीर साहिब का कथन है कि परमार्थ में उन्नति गुरु पर निर्भर करती है और सच्चा गुरु बड़े भाग्य से मिलता है।

गुरू के द्वारा प्राप्त नामदान से नीजघर की प्राप्ति

गुरमत का मार्ग अनोखा मार्ग है। जब गुरु की बतायी युक्ति के अनुसार मन तथा आत्मा की धाराएं शरीर के नौ द्वारों को खाली करके दोनों आंखों के बीच में तीसरे तिल पर, भ्रूमध्य में इकट्ठी हो जाती है, तब गुरमत का आरंभ होता है। यही हमारे अंदर परमेश्वर के निवास स्थान का द्वार है। जिसे हम दसवां द्वार कहते हैं।

इसलिए हमें किसी सच्चे गुरु की खोज करके उनसे नामदान प्राप्त करके हमें गुरुमत मनना है और संतों की शरण में रहते हुए संतमत के सिद्धांत पर चलना है और अपने दसवें द्वार, नीजघर पहुंचना है।

राधास्वामी

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