रूहानियत के रास्ते पर चलने का सबसे आसान तरीका: बाबाजी

Radha Soami- सत्संग में केवल रूहानियत के बारे में बताया जाता है। रूहानियत के रास्ते पर कैसे चलना है? उसके निर्देश क्या है? उन सब पर विचार किया जाता है। रूहानियत के रास्ते अपने आप को कैसे गुरु के हुक्म के अनुसार रखना है। कैसे? नेक नीति बनाए रखनी है। इन सभी बातों पर अमल किया जाता है। सभी संत-महात्मा हमें नेक नीति पर चलने और अपने आप को शांत रखने की विधि बताते हैं।

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सन्तों ने ये किया महसूस

आज तक जितने भी संत-महात्मा हुए हैं, उन सभी ने जो भी अपने जीवन में अनुभव किया है, महसूस किया है, जो उन्होंने जीवन में पाया है। उन सभी अनुभव को, विचारों को हमारे सामने रखते हैं और हमें बताते हैं कि हमें कैसे इस रूहानियत के रास्ते पर चलना है। और कैसे हक-हलाल की कमाई करते हुए परमात्मा का हो जाना है हमें हर रोज अपने गुरु का, अपने परमात्मा का, धन्यवाद करना है कि है। मालिक हे, आप का धन्यवाद है कि आपने हमें यह नेक जीवन दिया है और हमें संतों की शरण में रखा है।

अब हमारा कर्तव्य

संतों की शरण में आने के बाद हमारा कर्तव्य बनता है कि हम संतो के बताए गए रास्ते पर चलें। उनके अनुभव को समझें और रूहानियत पर नेक नीति से चले। जो भी संतों ने हमें बताया है हमें उस रास्ते पर चलना, संतों की संगति करना है। हक-हलाल की कमाई करनी है। किसी पूर्ण संत सतगुरु से प्राप्त नामदान की भक्ति करनी है। हमें भजन-सुमिरन करना है। बिना नागा करनी है। संत बताते हैं कि अगर यह मनुष्य जन्म हमारे हाथ से निकल जाता है, तो फिर पता नहीं कब जा करके हमें यह मनुष्य जन्म प्राप्त होगा और प्राप्त होगा भी या नहीं होगा। इसके बारे में भी स्पष्ट करते हैं कि कोई पक्का नहीं है कि हमें मनुष्य जन्म प्राप्त होगा। पता नहीं कहां जाकर कीड़े-मकोड़े, कीट-पतंगे बनेंगे। किस योनि में हमें जन्म मिलेगा।

रूहानियत में इन सब का बहुत महत्व

इसलिए संत फरमाते हैं कि भाई संतो के हुक्म पर चलो। भजन-सुमिरन करो, अपने आप को नम्रता पूर्वक बनाओ। अपने अंदर शांति, दीनता और संयम बनाए रखें। क्योंकि रूहानियत में इन सब का बहुत महत्व है। मन भजन-सिमरन में तब लगेगा, जब हमारे अंदर नम्रता होगी, दीनता होगी, संयम होगा, शांति होगी। इसलिए हमें अपने आप को शांत बनाए रखना है। कभी क्रोध नहीं करना है। हमें सदैव उठते-बैठते, जागते, चलते-फिरते उस परमात्मा की भक्ति में लगाए रखना है। उनका शुकराना करना है। बिना नागा भजन-सुमिरन करना है।

।।राधास्वामी।।

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