पूर्ण सतगुरू कौन? पहचान कैसे करें?

Radha Soami – बाबाजी हमेशा अपने सत्संग में फ़रमाते आये हैं कि संसार में बहुत संत महात्मा आए हैं और आते रहेंगे लेकिन इन सब में सच्चा और पूर्ण गुरु बनने योग्य कौन हैं? कैसे पहचान हो? यह जानना बहुत जरूरी है। सच्चे घर ले जाता है। स्वामी जी महाराज भी अपनी वाणी में यही फरमाते हैं| कि शब्द-स्वरूपी, शब्द -अभ्यासी गुरु की ही तलाश करनी चाहिए।

बाबा गुरिंदर सिंह जी

पूरा गुरु वही है जो हमें पांच शब्दों का  भेद देता है और इन पांच शब्दों के द्वारा हमें अपने सच्चे घर ले जाता है। स्वामी जी महाराज भी अपनी वाणी में यही फरमाते हैं। कि शब्द-स्वरूपी, शब्द -अभ्यासी गुरु की ही तलाश करनी चाहिए।

हजरत ईसा भी येही फ़रमाते हैं

कि अगर महात्मा पूर्ण नहीं होगा तो वह खुद भी अपने शिष्यों के साथ डूब जाएगा। फरमाया है, ‘अगर अंधा-अंधे का मार्गदर्शन करेगा, तो दोनों गड्ढे में गिरेंगे।’ पूरे और सच्चे गुरु की यही पहचान है कि वह हमारी आत्मा को अनहद शब्द के साथ जोड़ देते हैं। जिसे ऐसा गुरु मिल जाता है। वह अपने अंदर उस शब्द की ऊंची और मीठी आवाज को सुनना शुरू कर देता है। जो शुरू-शुरू में घंटे की आवाज के समान होती है।  वह अनहद शब्द ही आनंद और कभी बंद न होने वाला ऊंचा और सबसे सच्चा संगीत है। वह शब्द ही हमेशा हमारे अंदर गूँजने वाली ईश्वरीय आवाज़ हैं।

दर्शन देख जीवां गुरु तेरा

सच्चे पूर्ण गुरु अपने सेवक को उस शब्द को सुनने का भेद और तरीका बतलाते हैं। उस अनहद शब्द को अंदर सुनने, उसी में समाने की युक्ति बतलाते हैं। गुरु खुद उस शब्द या नाम के साथ जुड़े होते हैं। वह हमें भी उस शब्द या नाम के साथ जोड़कर परमात्मा से मिला देते हैं।   हजरत ईसा ने भी यही इशारा किया है ‘तुम मेरे अंदर समाये हुए हो, मैं उस परमात्मा के अंदर समाया हुआ हूँ।’  इसलिए तुम भी उस परमात्मा के अंदर समाये हुए हो। वह इस प्रकार कहते हैं, ‘जिसने मुझे देखा है, उसने अपने पिता को देखा है। क्या तुम सच नहीं मानते कि मैं पिता में और पिता मेरे अंदर है।

बिना इच्छाएं खत्म किए परमात्मा को पाना नामुमकिन

सच्चे गुरु की पहचान यही है, कि वह पाँच शब्दों का भेद दे, और अपने शिष्य को परमात्मा से मिलाने का सही तरीका और रास्ता बतलाएं। तो हमें भी सच्चे गुरु की शरण में जाकर भजन सिमरन पर ध्यान देना चाहिए। जिससे मनुष्य में आने का मकसद पूरा हो जाए।

प्रेरणादायक कहानी: दर्जी की तकदीर

एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवों में घूम रहा था। घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया, उसने अपने मंत्री को कहा कि इस गांव में कौन-सा दर्जी है, जो मेरे बटन को सिल सके।

उस गांव में सिर्फ एक ही दर्जी था, जो कपडे सिलने का काम करता था। उसको राजा के सामने ले जाया गया। राजा ने कहा कि तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो ? दर्जी ने कहा: हां सकता हुँ। उसने मन्त्री से बटन ले लिया, धागे से उसने राजा के कुर्ते का बटन फौरन टांक दिया। क्योंकि बटन भी राजा का था, सिर्फ उसने अपना धागा प्रयोग किया था। राजा ने दर्जी से पूछा कि कितने पैसे दूं ?

दर्जी की सोच दो रुपये

दो रुपये

उसने कहा :- “महाराज रहने दो, छोटा सा काम था।” उसने मन में सोचा कि बटन राजा के पास था, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया है। राजा ने फिर से दर्जी को कहा कि नहीं-नहीं बोलो कितने दूं ?

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दर्जी ने सोचा की दो रूपये मांग लेता हूँ। फिर मन में यही सोच आ गयी कि कहीं राजा यह न सोचे की बटन टांकने के मेरे से दो रुपये ले रहा है, तो गाँव बालों से कितना लेता होगा। क्योंकि उस जमाने में दो रुपये की कीमत बहुत होती थी। दर्जी ने राजा से कहा कि :- “महाराज जो भी आपकी इच्छा हो, दे दो।”

राजा के दो गांव

अब राजा तो राजा था। उसको अपने हिसाब से देना था। कहीं देने में उसकी इज्जत ख़राब न हो जाये। उसने अपने मंत्री को कहा कि इस दर्जी को दो गांव दे दो, यह हमारा हुक्म है। यहाँ दर्जी सिर्फ दो रुपये की मांग कर रहा था पर राजा ने उसको दो गांव दे दिए ।

इसी तरह जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ते हैं, तो वह अपने हिसाब से देता है और मांगते हैं, तो सिर्फ हम मांगने में कमी कर जाते हैं । देने वाला तो पता नहीं क्या देना चाहता है। अपनी हैसियत से और हम बड़ी तुच्छ वस्तु मांग लेते हैं ।

मालिक को पुर्ण समर्पण करना

इसलिए संत-महात्मा कहते है, ईश्वर को सब अपना सर्मपण कर दो। उनसे कभी कुछ न मांगों, जो वो अपने आप दें, बस उसी से संतुष्ट रहो। फिर देखो इसकी लीला। वारे के न्यारे हो जाएंगे। जीवन मे धन के साथ सन्तुष्टि का होना जरूरी है। हमें भजन-सुमिरन पर ज़ोर देना चाहिए। कम से कम ढाई घण्टे तक सिमरन करना बहुत जरूरी है। पूर्ण गुरु से शिक्षा प्राप्त करना मनुष्य जन्म का प्रथम काम है।

।।राधास्वामी।।

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