परमात्मा से मिलने का केवल सिमरन ही रास्ता : बाबाजी

Radha soami -सन्त फ़रमाते हैं कि हमें मनुष्य जन्म मिला है तो इसका भरपूर आनंद उठाना चाहिए। क्योंकि परमात्मा ने बहुत कुछ सोच समझकर हमें यह मनुष्य जन्म दिया है। अगर कलयुग में आकर हम जिन्दगी के चार दिन भी सुख और शांति के साथ गुजारना चाहते हैं?

तो वापस जाकर परमात्मा से भी मिलना चाहते हैं। तो सिर्फ नाम की कमाई ही एक मात्र रास्ता है। मगर हमारा मन हमे शब्द या नाम की कमाई की ओर जाने नहीं देता। बल्कि हमेशा पूजा-पाठ, कर्मकांड, जप-तप, दान पुण्य, आदि में ही लगाये रखता है।

कलयुग केवल “नाम” आधारा।
सिमर-सिमर नर उतरहि पारा।।

बाबाजी केे दर्शन


जब गुरु नानक देव जी से शिष्य ने पूछा सवाल

गुरु नानक देव जी जब आश्रम में बैठे अपने शिष्यों को गुरु ज्ञान दे रहे थे। तो शिष्य सवाल करता है: कि जब सारा संसार मेरे अंदर है, खंड-ब्रम्हांड मेरे अंदर हैं, अकाल पुरुष मेरे अंदर है, मेरा परमात्मा है तो फिर मुझे यह सब दिखाई क्यों नहीं देता? गुरु जी बोले सवाल उचित है। फिर गुरु नानक देव जी इसका बड़ा उचित जवाब देते हैं। आम कहावत है कि खजाने पर सांप होता है। अगर हम खजाना लेना चाहें, तो यह जरूरी है कि सांप को मार डालें।

गुरविंदर सिंह जी

मनरुपी साँप को मारना ही उचित रास्ता

जिस तरह जब तक सांप को पकड़ा न जाए, मारा न जाए, दौलत नहीं मिलती। इसी तरह ‘नाम’ का खजाना और परमात्मा, बेशक इसके अंदर हैं। मगर हृदय पर, मन रूपी सर्प बैठा हुआ है जो अंदर नहीं जाने देता। अब जो कुछ भी बयान किया है, यह जड़ नहीं और न ही शरीर में है। क्योंकि यह सब मन के परदे के पीछे छुपे है।

जब आप मन को पकड़ोगे, तो अंदर आपको सब खंड-ब्रम्हांड मिलेंगे। शरीर में तो हाड़, मांस और रक्त है। अगर कोई डॉक्टर चिरफाड करे, तो कुछ नहीं निकलता। अब श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं, कि यह जो हमारे शरीर का जाल है। इस पर मन रूपी सर्प बैठा हुआ है। हम सब पर मन का जहर चढ़ा हुआ है। सन्त बताते हैं कि मन रूपी सर्प के डसने से, कौन सा जहर चढ़ता है? चोरी, ठगी, दुराचार, विषय-विकार आदि का। हमने मन के जरिए जो कर्म किए हैं। वे भोग रहे हैं और जो कर्म अब कर रहे हैं, उनका फल आगे भोगेंगे।

बाबा जैमल सिंह महाराज के वचन

बाबा जेमल सिंह महाराज जी के अनमोल वचन हैं कि कोई किसी की क़दर, आदर करें या निंदा करे। आदर व स्तुति में खुश नहीं होना चाहिए और निंदा मे नाराज नहीं होना चाहिए। सदा राजी रहना और मालिक की रजा मे खुश रहना चाहिए। जहां भी रखे हमें यह चिंता करनी चाहिए की हमारे दिन, हर पल, सांस सब गिनती के हैं। उनका कैसे फायदा प्राप्त किया जाये। यह समय फिर से कभी नहीं मिलने वाला।

संत फ़रमाते हैं कि अंतर में चलने के लिए साथी जरूर होना चाहिए ,यानी बगैर पूरे गुरु के किसी की ताकत नहीं कि काल करम का मुकाबला कर सकें। इसलिए हमें सतगुरु की बहुत जरूरत पड़ती है। हमे सदैव गुरु को याद रखना चाहिए। अकेला अंतर में हरगिज कोई नहीं जा सकता है।

भजन का फिक्र

हमें भजन का फिक्र करना चाहिए। मन को दुनिया की वासना से निकालो, सूरत को शब्द मे रखो, हर वक़्त यही ताकीद है। यह करनी का मार्ग है। गला बाता नाल कुछ नहीं होना सिर्फ़ भजन-सिमरन करना ही पड़ेगा। चाहे जितने मर्जी अच्छे महल, कितनी धन दौलत इक्कठी करदे रहीये, कुछ नहीं होना। सिर्फ़ एको हुक्म शब्द धुन की कमाई देखी जाएगी। “नानक के घर केवल नाम निधान”।

भटक भटक के ये जग हारा
संकट में कोई दिया ना साथ
सुलझ गई हर एक समस्या
सतगुरू ने जब से पकड़ा हाथ

आओ, परमात्मा को याद करें।

जब हम किसी मुसीबत में होते हैं तो केवल परमात्मा हमारे साथ होता है। बाकी सब यार दोस्त, रिस्तेदार, सगे-संबंधी कोई भी हमारी सहायता नहीं करते। क्योंकि मनुष्य केवल सुख में ही साथ निभाता है। इसलिए सतगुरु बार-बार चेतावनी देते हैं कि भजन-सुमिरन करो और परमात्मा को प्राप्त करो। क्योंकि परमात्मा ही है जो पल-पल हमारा साथ देते हैं। सिमरन करेंगें परमात्मा के पास चले जायेंगे।

।।राधास्वामी।।

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