परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना कौनसी: सतगुरु ने बताई।

Radha Soami- संत-सतगुरु हमें इन बुरे विकारों पर लगाम लगाने की और इन्हें वश में करने की जरूरत पर जोर देते हैं। संत-महात्मा फरमाते हैं कि अगर एक बार हमारा मन बेकाबू हो जाए तो वह फिर कभी काबू में नहीं आ सकता। अगर एक बार इंद्रियां बेकाबू हो जाती हैं तो वह दिशाहीन समुंद्री जहाज में सफर करने जैसा है जिसका चट्टान के साथ टकराकर टुकड़े हो जाने जाना लगभग निश्चित है। तो हमें सतगुरु के हुकुम में रहना है, मन पर काबू पाने का यत्न करना है।

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अदभुत और असाधारण रचना

परमात्मा की सबसे असाधारण और अद्भुत रचना है- मनुष्य का मन। मन शक्तिशाली होने के साथ-साथ निर्बल भी है, ईमानदार होने के साथ-साथ बेईमान भी है। यह मन मनुष्य को सफलता की ऊंचाइयों तक ले जा सकता है और विनाश की हद तक भी पहुंचा सकता है। यह बहुत चालबाज और रहस्यमय है, मनुष्य के पास जो कुछ भी है उनमें से सबसे अधिक विनाशकारी और घातक मनुष्य का मन है।

अन्य कोई ऐसा यंत्र नहीं है जो इतना जटिल होते हुए इतना सूक्ष्म हो और जिसमें अपार क्षमता भी हो। इस मनरूपी यंत्र को हम कैसे इस्तेमाल करते हैं, यह पूरी तरह हम पर निर्भर है। हम इसके द्वारा विनाश कर सकते हैं या फिर किस इसकी पूरी क्षमता को अच्छे कार्यों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसी है मन की शक्ति!

बाबाजी

आत्मसयंम की कमी से मन बनता है ताक़तवर

हम अपनी कमजोरी के कारण और आत्मसंयम की कमी के कारण मन के अधीन हो जाते हैं और उसे बेहद ताकतवर बना देते हैं। सतगुरु कहते हैं- हम मन को पूरी आजादी देकर इसे बे-लगाम छोड़ देते हैं और खुद इसके गुलाम बन जाते हैं। हमें खुद अपने मन को दिशा दिखानी चाहिए, लेकिन इसकी बजाय हम वही चल पड़ते हैं। जिस दिशा में मन ले जाए। कौन इस बात से इंकार कर सकता है कि मन ज्यादातर मूर्खतापूर्ण हरकतें ही करता है और कभी कभार ही अक्लमंदी से काम लेता है। स्वतंत्र इच्छा, तर्क करने की शक्ति, बुद्धि और सोच-समझ के बारे में हम बात तो करते हैं लेकिन हमारे वचन, विचार और हमारी करनी साफ-साफ बता देते हैं कि हम कभी-कभार ही इन शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं।

मीरदाद ने कहा है: ” ऐसे सोचो कि तुम्हारा हर विचार आसपास में आग से लिखा जा रहा है ताकि हर प्राणी, हर पदार्थ उसे देख सके। और वास्तव में ऐसा ही होता है।” इस बात इस पर जरा गहराई से सोच विचार करो। अगर हम उन सभी की विचारों को जो हमारे मन में आते है, स्वीकार कर ले तो शायद हमें खुद से भी नजर नहीं मिला पाएंगे। जिस तरह के विचार लगातार हमारे अंदर चलते रहते हैं, अगर हमें उन्हें जाहिर करना पड़े तो हम खुद ही खुद ही बौखला जाएंगे। हमने सालों से अपने मन में जो क्रोध और मलिनता इकट्ठी कर रखी है उसका पता चलने पर हम बुरी तरह से दंग रह जाएंगे।

हमारा मन कौवें के जैसे

यहां इस कड़वी सच्चाई का वर्णन किया गया है: “हमारा मन कौवे की तरह है। यह हर चमकने वाली चीज को उठा लेता है, चाहे धातु से बनी चीजों को इकट्ठा करने से हमारे घोंसले में कितनी ही असुविधा क्यों ना हो जाए।” हमारे मन में इकट्ठी हुई यह बेकार कि चमकने वाली धातुएं सड़कर कर जानलेवा बीमारियों में बदल गई है। जिन्होंने मन को जकड़ लिया है। हमारा हर विचार, हर लफ्ज और हर कर्म या तो मन को उन्नत करता है ताकि मन ज्यादा एकाग्र हो सके या फिर उसे अपने मूल से दूर कर देता है। सतगुरु भजन-सुमिरन द्वारा इन पांचों विकारों को वश में करके इन पर जीत हासिल करने की जरूरत पर जोर देते हैं। ये पांच विकार हैं- काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार। ये विकार रुहानी तरक़्क़ी के लिए बहुत बडी बाधाएँ और रुकावटें हैं।

सच्चे सतगुरु की खोज

इन सभी विकारों को दूर करने के लिए हमें किसी संत-सतगुरु की शरण में जाना पड़ेगा। हमें किसी सच्चे गुरु की खोज करनी पड़ेगी। उनसे नाम की युक्ति प्राप्त करनी है, नामदान की युक्ति प्राप्त करके हमें 24 घंटे, रात-दिन भजन-सुमिरन करना है और हमें अपने परमपिता परमात्मा को प्राप्त करना है।

।।राधास्वामी।।

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