परमात्मा की रजा में रहना मतलब रुहानियत का असल रास्ता : बाबाजी

Radha Soami – बाबाजी ने अपने हर सत्संग में हमें यह समझाने की कोशिश की है की हमें उसकी रजा में राजी रहना चाहिए। उसकी मौज में और उसके हुकुम में रहना चाहिए। क्योंकि सुख और शांति पाने का इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है। जितना हम दूसरे रास्ते पर भटकते रहेंगे उतना ही हम परेशानी और दुख उठाएंगे।

सतगुरू के हुक्म की पालना

बाबा जी फरमाते हैं कि हमें सदैव अपने सतगुरू के हुक्म की पालना करनी चाहिए। सतगुरु द्वारा बताए गए गुरुमंत्र, नामदान पर अमल करना चाहिए। हमें कभी भी नामदान को नहीं भूलना चाहिए। हमारे मन में, हमारे दिल में, हमारे दिमाग में हर वक्त उसका जाप होना चाहिए, उसका सिमरन चलते रहना चाहिए। ताकि हमारी लीव उस परमपिता परमात्मा के साथ जुड़ी रहे।

बाबा जी अपने सत्संग में कई बार बतला चुके हैं कि परमात्मा हमें वही चीज देता है, बख़्सता है जो हमारे लायक होती है, जो हमारे जीवन में सुख और शांति प्रदान करती है। परंतु मनुष्य हमेशा ऐसी चीजों की कामना करता है जिससे उसको भविष्य में परेशानी पैदा होती है।

उसको उसके खो जाने के बाद दुख उठाना पड़ता है। जबकि मनुष्य को चाहिए कि हमें उस परमपिता परमात्मा की रजा मे राजी रहना चाहिए। क्योंकि कभी भी पिता अपने पुत्र को दुखी नहीं देख सकता। वह हमेशा उसको खुश देखना चाहता है, तो यही परमात्मा असलरूप है कि वह हमें जो भी वस्तु जो, भी चीज देता है। वह हमारे लिए हितकारी होती है।

सन्त हमेसा रुहानियत का सही और सच्चा रास्ता बताते हैं।

जो भी हम सत्संगों में सुनते है, वो सब संतों का अनुभव होता है जो सन्त हमारे सामने रखते है। हमे सतगुरु, संत इन सबके हुकुम में चलना चाहिए, क्योंकि सन्त हमेसा रुहानियत का सही और सच्चा रास्ता बताते हैं। इसीलिए हमे परमात्मा की प्राप्ति के लिए सदैव उनके हुकुम में रहना चाहिए। सदा हक़-हलाल की कमाई पर गुजारा करना चाहिए। ताकि हमारी रुहानियत के रास्ते कोई रुकावट ना आये।

एक साधारण और सही रास्ता भजन-सिमरन

सतगुरु का एक हुकुम ये भी है कि हमे हमेशा भजन-सिमरन करना चाहिए। कभी भी सिमरन ध्यान नही भटकना चाहिए।क्योंकि यही एक साधारण और सही रास्ता है जिसके द्वारा हम अपने निज घर जा सकते हैं। अपने परमात्मा से मिलाप कर सकते है। तो आईये ज्यादा से ज्यादा भजन-सिमरन करें।

राधास्वामी

One thought on “परमात्मा की रजा में रहना मतलब रुहानियत का असल रास्ता : बाबाजी

  • July 17, 2020 at 4:28 pm
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    I have heard many great persons but what surprises me people are happy in satsang but their habit of criticism, their ability to fool people, their moh maya n lobh does not leave them. At least some change should be visible in people who visit satsang but they remain the same. Why is this?

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