परमात्मा के दरबार में केवल इन सबको करने से मिलता है प्रवेश: बाबाजी

Radha soami- बाबा जी अक़्सर अपने सत्संग में फरमाए करते हैं कि परमात्मा के दरबार में केवल प्रेम को, प्यार से ही प्रवेश मिलता हैं। बाकी सब बेकार की बातें हैं। जिसको भी परमात्मा को पाना है तो हमें अपने अंदर नम्रता लानी होगी। प्रेम भावना जागृत करनी होगी। अपने गुरु से प्राप्त नामदान की युक्ति पर अमल करना होगा, अन्यथा कोई और रास्ता नहीं है उस के दरबार में जाने का।

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संतों के सुझाव

जाति पाँति पूछै न कोई। हरि कहँ भजै सो हरि का होई।

संत हर बार इन बातों पर जोर देते हैं की परमात्मा के दरबार में किसी को भी अपनी जाति-पाँति नहीं बतानी होती। वहां केवल जो परमात्मा की भक्ति करता है, वही परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। जहां हमारे कर्मों का हिसाब-किताब होगा वहां कोई यह सवाल नहीं पूछने वाला कि तुम हिंदू थे, ईसाई थे, मुसलमान थे या अमेरिका से आए, भारत से आए, अफ्रीका से आए या ऑस्ट्रेलिया से आए। वहां पर केवल भक्ति भाव और प्रेम की कद्र होती है।

इसी तरह साईं बुल्लेशाह जो जाति के सैयद थे। मुसलमानों में एक बेधड़क महात्मा हुए हैं, वह अपनी कलाम में स्पष्ट लिखते हैं।

अमलां उत्ते होन निबेडे, खड़ी रहणगिआं जातां।

जो अपने अमलों या कर्मों पर ध्यान देते हैं, वे ही परमात्मा को मंजूर है। जो जाती-पाँति के अहंकार में फंसे हैं, उनकी उस दरगाह में कोई कदर नहीं है। वो लोग इसी अहंकार में डूबे रहते हैं कि उनकी जात ऊंची है। ऐसे लोग परमात्मा के करीब नहीं पहुंच सकते।

बाबा गुरिंदर सिंह जी

तुलसी साहिब अपनी एक वाणी में यही समझाने की कोशिश करते हैं:

नीच नीच सब तरि गये, सन्त चरन लौलीन।

जातहिं के अभिमान से, डूबे बहुत कुलीन।।

तुलसी साहिब फरमाते हैं जो अपने आप को नीचा समझता है, जिसके अंदर नम्रता और दीनता है, जो संतो के चरणों से प्यार रखता है, उनके उपदेश पर चलता है, वह इस भवसागर से पार हो जाता है। जिनको जात-पात का अभिमान है, वे इस भवसागर में गोते खाते हैं। कौमें और मज़हब इस जाति-पति के अभिमान में डूबे रहते हैं और डूबते ही चले जाते हैं।

बाबाजी बार-बार समझाते हैं

इसीलिए बाबा जी हमें बार-बार यह समझाने की कोशिश करते हैं कि हमें केवल अपने परमात्मा का ध्यान करना है। हमें कभी भी ऊंच-नीच, जात-पात, धर्म-मजहब के बारे नहीं सोचना चाहिए। क्योंकि परमात्मा के दरबार में केवल और केवल प्यार और प्रेम, भक्ति भाव ही देखा जाता है, जो व्यक्ति गुरु से प्राप्त नामदान की युक्ति पर अमल करेगा। भजन सुमिरन करेगा। वही इस भवसागर से पार हो सकता है। इसलिए हमें इस सांसारिक रिवाजों को छोड़कर केवल भक्ति में लीन हो जाना है। भजन सुमिरन में लीन हो जाना हैं और परमात्मा को प्राप्त करना है।

।।राधास्वामी।।

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