नामदान के बाद चार जन्म और क्या ये सही है? जानें

Radha Soami- इस धरती पर बहुत से संत महात्मा आए और चले गए। सभी का एक मत है कि परमात्मा एक है और उसको भजन-सुमिरन के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। नामदान के प्राप्त होने के बाद इस चौरासी के आवागमन के चक्कर का झंझट समाप्त हो जाता है। परंतु फिर भी कई बातें निकल कर सामने आती हैं कि नामदान के बाद केवल चार जन्म देने पड़ते हैं। इस पर विचार करना बहुत जरूरी है।

यह बहुत बड़ी गलतफहमी

संतमत के साहित्य को पढ़कर उसका गलत मतलब निकालकर हम अपने आप को तस्सली देते रहते हैं; इनमें सबसे ज्यादा बेतुकी गलतफहमी यह सोचना है की एक बार नामदान मिल जाने के बाद हमें ज्यादा से ज्यादा चार जन्म ही लेने पड़ेंगे या चार जन्म ही मिलेंगे। यह बहुत बड़ी गलतफहमी है।

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बड़े महाराज जी के इन वचनों का हवाला दिया जाता है की नामदान मिलने के बाद “चार जन्म से ज्यादा नहीं लगेंगे।” ठीक है, सतगुरु ने वाक्य ऐसा कहा था! सतगुरु के इन वचनों का गलत अर्थ निकालाना हमारे लिए बहुत आसान है क्योंकि हमारा दायरा बहुत छोटा है। सतगुरु के वचन बड़े गहन और गंभीर हैं, इनका असल अर्थ हमारी समझ से बहुत परे है! इन अर्थों को समझना बहुत जरूरी है। अलग-अलग समय में सतगुरु अपने वक्त के लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए अलग-अलग ढंग अपनाते रहे हैं। लेकिन संदेश हमेशा एक ही रहा है। अलग-अलग युगों में हुए संत-सतगुरु अपने-अपने ढंग से परमार्थ का उद्देश्य उपदेश देते रहे हैं।

नामदान के बाद परमार्थी जीवन

नामदान प्राप्त कर लेने के बाद सतगुरु हमारी जीवन को परमार्थी जीवन कहते हैं, ऐसा जीवन जिसमें हम रोज भजन-सिमरन करके उनके हुक्म का पालन करते हैं और नामदान के समय किए गए वादों को भी पूरी तरह निभाते हैं। जरा सोचिए कि सतगुरु अपने शिष्यों पर कितना ज्यादा विश्वास करते हैं। उन्हें पूरी उम्मीद होती है एक बार नामदान लेने के बाद उनके शिष्य दुनियावी की चीजों से मुंह मोड़कर अपना जीवन परमार्थ में लगाएंगे। जीवन में भजन-सुमिरन की रहनी अपनाएंगे। वह हमारे उत्साह और हमारे इरादे पर शक नहीं करते। उन्हें हम पर पूरा भरोसा होता है। इसलिए वह कहते हैं कि एक बार नामदान मिल जाने पर जब भजन-सुमिरन हमारी जिंदगी बन जाता है, तभी हम ज्यादा से ज्यादा चार जन्मों के बाद मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं और सचखंड में पहुंच सकते हैं।

महाराज चरण सिंह जी

हमें उनका संदेश समझने की जरूरत है: भजन-सिमरन से उनका यह भाव नहीं है कि आसन पर बैठकर हम घड़ी देखते रहे और बीच में कभी-कभार मशीन की तरह भजन-सिमरन करना शुरू कर दें! नामदान के मिल जाने से ही चार जन्मों में परमात्मा से मिलाप की और मुक्ति प्राप्त करने की गारंटी नहीं मिल जाती। हमें भजन-सिमरन में लीन होना पड़ेगा।

अगर नामदान मिल जाने से मुक्ति की गारन्टी मिल जाती तो फिर सतगुरु हमें भजन-सुमिरन करने के लिए बार-बार क्यों कहते? नाम से ही मोक्ष के द्वार भी होती तो सुबह-सवेरे तीन बजे उठने का कष्ट क्यों करना पड़ता? हर रोज ढाई घंटे स्थिर होकर बैठने की परेशानी क्यों सहनी पड़ती? नामदान तो एक जरिया है, भजन-सिमरन मंजिल है! चार जन्मों “तक भजन-सिमरन में लगे रहने से” मुक्ति प्राप्त होना निश्चित है, ना कि केवल नामदान प्राप्त करने से। इसके लिए भजन-सिमरन ही एकमात्र उपाय है, यही एकमात्र साधन है।

ये नहीं किया तो नाम लेना व्यर्थ

यही बात नामदान की बख्शीश पर भी लागू होती है। नामदान लेने के बाद हम भजन-सिमरन में अभ्यास करना होगा। अगर हम ऐसा नहीं करते तो हमारा नामदान लेना व्यर्थ है। अपनी सुविधा के अनुसार धारणाएं बनाकर उनके नए-नए अर्थ लगाने में हम बड़े माहिर हैं लेकिन ऐसा करने से वे सच साबित नहीं हो सकती।

इसलिए हमें इधर-उधर की बातों पर ध्यान ना देकर हमें केवल अपना ध्यान तीसरे तिल पर एकाग्र करना चाहिए। हमें गलतफहमी में नहीं पड़ना चाहिए। हमें केवल भजन-सिमरन करना चाहिए, क्योंकि यही एकमात्र रास्ता है। जन्म-मरण के चक्कर से छूटने का केवल एक ही जरिया है और वह है भजन-सिमरन। हमें चाहिए ज्यादा से ज्यादा सुमिरन करें। अपने असल काम को समझे और परमात्मा को प्राप्त करें।

।।राधास्वामी।।

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