नाम की कमाई का अन्तिम समय, अब तो करो विचार : बाबाजी

Radha Soami Satsang Beas – बाबा जी अक्सर अपने सत्संग में नाम की दौलत को कमाने पर बहुत जोर देते हैं। बार-बार हम सब को समझाने की कोशिश करते हैं कि यही समय है, नामदान की युक्ति से अपने मनुष्य जीवन को सफल बनाने का। नामदान की युक्ति के द्वारा हम परमपिता परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं। हम परमात्मा से बिछड़ी हुई आत्मा को परमात्मा से बिना सकते हैं। क्योंकि इसके बाद कोई अवसर नहीं मिलने वाला। जिससे हम आत्मा को परमात्मा से मिला सकें।

शेख़ फ़रीद जी कहते हैं

फरीदा चारि गवाइआ हंढ़ि कै चारि गवाइआ संमि।।

लेखा रबु मंगेसीआ तू आहों केरहे कंमि।।

आप जीव को सावधान करते हैं कि तुझे संसार में परमात्मा की भक्ति के लिए और उसके नाम की दौलत इकट्ठी करने के लिए भेजा गया था। यदि तू यह दौलत इकट्ठी नहीं करेगा तो लोक-परलोक दोनों में बेइज्जत होगा। परमात्मा की भक्ति के बिना तू मृतक देह से अधिक नहीं। तू बेशक परमात्मा को भूल जा परंतु परमात्मा की दृष्टि सदा तेरे कर्मों पर है।

गुरु नानक साहिब समझाते हैं

हमें आवागमन के बंधन तोड़कर परमात्मा से मिलाप करने के लिए मनुष्य जन्म की अमूल्य दात दी गई है। परंतु हम संसार के धंधों में इस प्रकार फंसे हुए हैं कि जीवन के इस मूल उद्देश्य की ओर हमारा कभी ध्यान ही नहीं जाता। इसके विपरीत, जो लोग पूरे गुरु की हिदायत पर चलते हुए शब्द, नाम या कलमे से लिव जोड़ लेते हैं, वे सदा के लिए भवसागर से पार हो जाते हैं। बाकी जीव यही आवागमन के चक्कर में पड़े रहते हैं।

परमात्मा से लिव जोड़ने में कुछ बदलना नही पड़ता

गुरु समझाते हैं अंतर में शब्द से लिव जोड़ने के लिए किसी को अपनी कौम, मजहब या मुल्क बदलने की आवश्यकता नहीं। न ही घर-बार त्यागकर जंगलो या पहाड़ों में जाने की आवश्यकता है। कमल के फूल की जड़े पानी में अवश्य होती है परंतु फूल सदा पानी से बाहर रहता है। मुर्गाबि सदा पानी में रहती है परंतु इसके पंख पानी में नहीं भीगते। वह जब चाहती है, पानी से बाहर उड़ान भर लेती है। उसी प्रकार हम संसार में रहते हुए अपनी सुरत या लिव अंदर शब्द जोड़कर सहज ही भवसागर से पार हो सकते हैं।

आओ सिमरन करें, एक नेक काम करें।

हमें संतो के द्वारा बताए गए उदाहरणों से ज्ञान प्राप्त करके उन पर अमल करना है। पूर्ण संत सतगुरु से नामदान की युक्ति प्राप्त करनी है। नामदान पर अमल करना है। ज्यादा से ज्यादा समय भजन-सिमरन को देना है, ताकि हमारा असल मकसद पूरा हो। और हम अपने परमधाम पहुंच जाएं। जिस काम के लिए हम आए हैं, वह काम पूरा हो जाए और आत्मा परमात्मा से जा मिले।

राधास्वामी

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