मनुष्य के बारे में हिंदू धर्म ग्रन्थों में ये बताया है। क्या आप जानते हैं?

Radha soami-बाबाजी अपने सत्संग में समझते हैं- हिंदू धर्म ग्रंथों में बताए गया हैं कि मनुष्य जन्म लेने से पहले हम चौरासी लाख योनियों से गुजरते हैं और कर्मवार पेड़-पौधे, कीड़े-मकोड़े, पक्षियों और पशुओं की योनि में से गुजरते हुए हमारा विकास होता हैं।

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पेड़-पौधे, कीड़े-मकोड़े, मछली, पक्षी और पशुओं की योनियों में से गुजरते हुए हम सबसे ऊंची योनि यानी मनुष्य योनि में पहुंचते हैं। जिसे सृष्टि का सिरताज कहा जाता है। निचली योनियों में जीवों के नए कर्म नहीं बनते, क्योंकि इन योनियों में जीव वह के अंदर विवेक की ताकत नहीं होती और वह अपने स्वभाव के मुताबिक ही कर्म करते हैं। पेड़-पौधे केवल पानी, धुप और नमी के जरिए ही जीवित रहते हैं। पशुओं को ज्यादा भूख और प्यास महसूस होती है इसलिए जीने के लिए भोजन और पानी की तलाश में ही उनका जीवन बीत जाता है। उनमें इससे ज्यादा चेतना नहीं है। वह केवल कर्मों का भुगतान कर रहे हैं।

इसलिए मनुष्य सबसे श्रेष्ठ होता है

इसके विपरीत मनुष्य सारे प्राणियों में सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि उसे विवेक की ताकत है। हम अपनी बुद्धि के द्वारा अच्छे और बुरे कर्मों की पहचान कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि उस कुलमालिक ने हमें इस काबिल बनाया है कि हम भजन-सिमरन द्वारा उससे मिलाप कर सकते हैं। अपने शक्तिशाली मन की मदद से या तो हम रूहानी तरक्की करते हुए बहुत आगे बढ़ सकते हैं या फिर प्रलोभनों और इच्छाओं के शिकार हो सकते हैं।

चरण सिंह महाराज

मनुष्य के रूप में भी हर जन्म में हमारी चेतना का निम्न स्तर से उच्च स्तर की ओर अब तक विकास होता है। जब तक कि हमारा परमात्मा से मिलाप नहीं हो जाता। आत्मा के विकास के लिए जीव को जन्म-मरण के कई चक्रों से गुजरना पड़ता है और यह इस बात पर निर्भर करती है कि हमारे कर्मों का बोझ कितना है। हमारे इन कर्मों और उनके फल के कारण एक कभी न खत्म होने वाला सिलसिला बन जाता है और इस सिलसिले का कारण है हमारी इच्छाएं।

स्वामी अन्नामलाई कहते हैं

“सभी इच्छाएं आपके लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं, यहां तक कि रूहानीयत से जुड़ी हुई इच्छाएं भी।” जब तक हमारे कर्मों का भुगतान नहीं हो जाता, हमारी आत्मा आवागमन के चक्कर में घूमती रहेगी। मनुष्य जन्म में भी आत्मा के विकास का सिलसिला जारी रहता है। इस विकास का अर्थ है- अपने आप में सुधार लाना, किसी आत्मज्ञानी मार्गदर्शक से भजन-सिमरन की युक्ति सीख कर अंतर में रूहानियत से जुड़ना और इसके जरिए अपने कर्मों को खत्म करना। भजन-सिमरन के अभ्यास से आत्मा निर्मल हो जाती है और वापस अपने रूहानी स्वरूप में आ जाती है। यही हमारी असलियत है।

अगर हम आग में ईंधन रहेंगे तो आग जलती रहेगी, इसी तरह अगर हम कर्मरूपी आग ईंधन डालते रहेंगे तो हम बार-बार यही वापस आते रहेंगे, क्योंकि कर्म ही हमारे जन्म मरण के चक्कर में फंसने का कारण है। इसलिए हमें इन कर्मों को त्यागने के लिए भजन-सिमरन करने की जरूरत है।

।।राधास्वामी।।

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