महान सन्तों के अनुभव जो सुमिरन के द्वारा परमात्मा से जुड़े हैं: संतमत

Radha soami satsang beas- महान संतों के अनुभावों से हम बहुत कुछ सीखते हैं। जिनमें सेवा भावना, भजन-सुमिरन, आत्मा – परमात्मा के बारे जानकारी प्राप्त करते हैं। ऐसे ही कुछ संत हुये जिन्होंने ने ये शब्द हमारे सामने रखे। आईये जानें।

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महाराज चरन सिंह

शिष्य को संतमत समझाकर, उसे इस मार्ग पर लगाकर और उसके अंदर शब्द या नाम के साथ प्रेम पैदा करके देह-स्वरूप गुरु का कार्य पूरा हो जाता है। इसके बाद देह-स्वरूप के प्रेम को शब्द या नाम के साथ प्रेम में बदलना जरूरी है, क्योंकि हमें दुनिया और शरीर से खींचकर परमात्मा के साथ मिलाने का काम शब्द या नाम ही करता है।

महाराज सावन सिंह

सावन सिंह जी महाराज समझाते हैं तीसरे तिल पर पहुंचने से हमें न केवल हमारी कल्पना से कहीं अधिक लाभ प्राप्त होंगे बल्कि यह भी पता चलेगा कि नाम का संपूर्ण खजाना अंदर हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।

तीसरे दिन में सब कुछ है, जिसकी शान और महिमा का अंदाजा हम कल्पना के जरिए या सपने में भी नहीं कर सकते। खजाना आपके अंदर है और वहां आपके लिए ही रखा हुआ है। आप जब भी अंदर जाएंगे, उसको पा सकेंगे। आप मेरी बात मानिए और हमेशा के लिए यह समझ लीजिए कि हरएक चीज- यहां तक की सिरजनहार भी- आपके अंदर है और जिस किसी ने उसको प्राप्त किया है तीसरे दिन के अंदर जाकर ही प्राप्त किया है, आप भी अंदर जाकर ही प्राप्त कर सकेंगे।

बाबा जैमल सिंह

बाबा जैमल सिंह जी समझाते हैं किस सच्ची सेवा तो केवल भजन-सुमिरन है। समझाते हैं जिन्हें भजन-सुमिरन जो उन्हें अच्छा लगेगा तो करेंगे जी। शब्द-धुन उनकी प्रेम-प्रीति में सुरत, निरत व निज-मन तीनों को हाजिर रखना। जिस जगह रखें राजी रहना जी और कारोबार सब उन्हीं का है। जहां रखें खुश रहना और जो काम करना सब परमात्मा का ही समझ कर करना क्योंकि यह सब कार्य उन्हीं की हुकुम के अनुसार हो रहा है। इसलिए हमें उनकी सच्ची सेवा करनी है। सच्ची सेवा से मतलब है कि हमें ज्यादा से ज्यादा भजन सुमिरन करना है। जी भजन सुमिरन करें परमात्मा को प्राप्त करें जी।

एकाग्रता चमत्कार नहीं

संत समझाते हैं कि सुमिरन से मिलने वाली एकाग्रता किसी चमत्कार से प्राप्त नहीं हो जाती। एकाग्रता के लिए जबरदस्त यतन करना पड़ता है और उस सुमिरन करने के लिए बार-बार दी गई हिदायतों का पालन करना पड़ता है।

जब सुमिरन पक्का हो जाता है तो ऐसा महसूस होने लगता है कि मनरूपी जानवर को वश में किया जा रहा है। फिर हम संकल्पों या विचारों की भूल-भुलैया से बाहर निकल आते हैं और हमें इस बात की संतुष्टि महसूस होती है कि हम व्यावहारिक रूप से सतगुरु के उपदेश पर चल रहे हैं। फिर हम सांसारिक आलस्य की गहरी नींद से जाग जाते हैं और हमारी आत्मा अंधकार की लंबी रात से निकलकर प्रभात के प्रकाश में आ जाती है।

।।राधास्वामी।।

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