खोटे सिक्के की किम्मत कोई विरला ही जानें: बाबाजी

Radha Soami- बाबाजी अपने सत्संग में कई दफा यह समझाते रहते हैं की खोटे सिक्के से खरा सिक्का बनो। हमें दुनिया की परवाह न करके केवल उससे परमात्मा का ध्यान करना है, क्योंकि परमात्मा ही जानता है कि हम उसकी नजर में खरे हैं या खोटे। वहां पर हमारे कर्मों का हिसाब देखा जाता है। जबकि परमात्मा हमें हर तरीके से स्वीकार करते हैं। हम खरे हैं या खोटे हैं, हमें केवल अपने कर्मों पर ध्यान देना है।

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किस्सा खोटे सिक्के का

गुरु जी का बहुत प्यारा भक्त था। जिसका नाम अवतार था।
वह छोले बेचने का काम करता था। उसकी पत्नी रोज सुबह-सवेरे उठकर छोले बनाने में उसकी मदद करती थी।

एक बार की बात है। अवतार के गांव में एक फकीर आया। उस फकीर जिसके पास खोटे सिक्के थे। उस फकीर को खाने के लिए कुछ वस्तु चाहिए थी। परंतु किसी भी दुकानदार ने उस फकीर को वस्तु देने से इनकार कर दिया। क्योंकि उसके पास खोटे सिक्के थे। उसको सारे बाजार में कोई वस्तु नहीं देता हैं तो वह अवतार के पास छोले लेने आता हैं।

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अवतार ने खोटा सिक्का देखकर भी उस फकीर को छोले दे दिए। लेकिन फकीर बार-बार खोटे सिक्के लेकर के अवतार के पास जाता है। ऐसे ही चार-पांच दिन उस फकीर ने अवतार को खोटे सिक्के देकर छोले ले लिए और उसके खोटे सिक्के चल गए।

जब बाजार में फैली ख़बर, खोटे सिक्के चलते हैं

जब सारे बाजार में अब यह बात फैल गयी की अवतार तो खोटे सिक्के भी चला लेता हैं। पर अवतार लोगों की बात सुनकर कभी जवाब नहीं देते थे। अपने गुरु की मौज में खुश रहते थे।

एक बार जब अवतार पाठ पढ़ करके उठे तो अपनी पत्नी से बोले – क्या छोले तैयार हो गए ?
पत्नी बोली – आज तो घर में हल्दी -मिर्च नहीं थी और मैं बाजार से लेने गयी तो सब दुकानदारों ने कहा कि यह सब खोटे सिक्के है। जिनसे हम आपको यह बस सामान नहीं दे सकते। सब दुकानदारों ने मना कर दिया और मैं वापस खाली हाथ लौट आई।

पत्नी के शब्द सुनकर सतगुरु की याद में बैठ गए और बोले-“जैसी तेरी रज़ा ! तुम्हारी लीला कौन जान सका हैं।
तभी आकाशवाणी हुई -” क्यों अवतार तू जानता नहीं था कि यह खोटे सिक्के हैं !”
अवतार बोला -“गुुुरु जी मै जानता था !”
सतगुरु ने कहा – फिर भी तूने खोटे सिक्के ले लिए ऐसा क्यूँ ?भले मानुष !

मैं खोटा सिक्का हूँ।

अवतार बोला – हे दीनानाथ ! मैं भी तो खोटा सिक्का हूँ। इसलिए मैंने खोटा सिक्का ले लिया, कि जब मैं तुम्हारी शरण मे आऊँ तो तू मुझे अपनी शरण से नकार ना दे।
क्योंकि आप तो खरे सिक्के ही लेते हो आप स्वयं सब जानते हो। खोटे सिक्कों को भी आपकी शरण मे जगह मिल सकें !
थोड़ी देर में दूसरी आकाशवाणी हुई – हे भले मानुष ! तेरी हाज़िरी क़बूल हो गयी हैं। तू गुरु जी का खोटा सिक्का नहीं खरा सिक्का हैं।

जो भी कर्म करो सतगुरु को समर्पित करते रहो। फल के बारे मे मत सोचो। आप देखना जिंदगी की गाड़ी कितनी तेज गति से दौड़ेगी। पलटकर नही देखना पड़ेगा l

परमात्मा को प्राप्त करो।

आओ हम यह निर्णय करें कि हमें परमात्मा को प्राप्त करना है। इसलिए हमें भजन-सुमिरन पर जोर देना है। हमें अपने आप को खरी कसौटी पर उतरना होगा। हमें खोटा सिक्का नहीं बनना है। हमें अपना कर्म करना है। हमें अपना कार्य यानी कि भजन-सिमरन करना है, क्योंकि इसी द्वारा हम परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं।

।।राधास्वामी।।

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