जीव अगर ये काम करे तो बहुत जल्दी पा लेगा अपना लक्ष्य: बाबाजी

Radha Soami-स्वामीजी महाराज अक्सर फरमाया करते थे कि मनुष्य जन्म में आने का केवल एक ही मकसद, एक ही उद्देश्य है। इस आवागमन के चक्कर से छुटकारा मिले और हम अपने धाम यानि परमात्मा के पास पहुंच जाएं। तो हमारा उद्देश्य पूरा हो जाएगा। लेकिन इसके लिए हमें क्या करना पड़ेगा? संत बताते हैं कि हमें किसी पूर्ण संत-सतगुरु की शरण में जाना होगा। अब बात आती है कि उनकी पहचान कैसे हो?

बाबाजी से सवाल जवाब

भजन सिमरन जीवन का एक ढंग!

यह नहीं कि आप केवल कुछ घंटों के लिए एक कमरे में अपने आप को बंद कर ले और फिर सारा दिन भजन-सुमिरन को भूले रहे। भजन को आपके जीवन का एक अंग बन जाना चाहिए और आप के हर दैनिक कार्य और व्यवहार में चलना चाहिए। यही अपने आप में भजन का प्रभाव है। भजन-सिमरन आपके कार्य मे झलकना चाहिए। सिरमन करने से अपने अंदर सेवा भावना को जागृत करता है जिससे मन मे नम्रता आये और हम अपने काम में सफल हो।

संतमत की शिक्षा

स्वामीजी के अनुसार रहना, संतमत के वातावरण में रहना, अपने आप में भजन ही है। आप अपने प्रतिदिन के भजन-सुमिरन के लिए वह वातावरण क्षण-क्षण बना रहे हैं। जो भी आप काम करें। वह भजन में बैठने के लिए आपके अंदर शौक और प्यार पैदा करेगा। इस प्रकार भजन हमारे लिए जीने का एक तरीका बन जाएगा। इससे हम हर वक्त अपने भजन के द्वारा पैदा किए गए वातावरण में रहने और कार्य करने लगेंगे। जिससे भजन सिमरन में मन लगेगा और आध्यात्मिक रास्ते में बहुत सहायता मिलेगी।

बाबा गुरिन्दर सिंह जी

महाराज स्वामीजी फरमाते हैं की उस नामरूपी दौलत को प्राप्त करके उसे अपने अंदर इतना दबाकर रखो कि इसकी खुशबू तक बाहर ना जाए। सन्त बताते हैं कि न तो इस दुनिया में कोई उसका अधिकारी है, न किसी को खरे और खोटे की पहचान है और ना ही उसका कोई ग्राहक है और ना ही कोई इसकी कीमत देने को तैयार है।

लोग तो बेटे बेटियों के ग्राहक हैं, धन-दौलत के अभिलाषी हैं। वे उस नामरूपी दौलत की कीमत देने को तैयार नहीं। उसकी कीमत क्या देनी पड़ती है? संत बताते हैं कि हमें अपने आप को उस मालिक के हवाले करना पड़ता है। हमें उसकी करनी अनुसार चलना पड़ता है। उसकी रजा में रहना पड़ता है और हमें जिस हाल में रखे उसकी मौज में खुश रहना पड़ता है। जिस हालत में भी वह मालिक रखता है उसकी हालत में रहते हुए नाम की कमाई करनी पड़ती है।

स्वामी जी महाराज का कथन

धाम अपने चलो भाई। पराये देश क्यों रहना।।

काम अपना करो जाई। पराये काम नहीं फँसना।।

नाम गुरु का संभाले चल। यही है दाम गंठ बंधना।।

जगत का रंग सब मैला। धुला ले मान यह कहना।।

हमें पूर्ण सतगुरु से नामदान की युक्ति प्राप्त हो गई है तो हम उसका सुमिरन करें और हम ज्यादा समय भजन-सिमरन को दें। स्वामी जी बताते हैं कि परमात्मा के घर की तरफ चलो, पराए घर में नहीं रहना। हम कितने समय तक किसी के घर रह सकते हैं? किसी न किसी दिन तो हमें अपने घर जाना ही हैं। हम जिस काम आए हैं, हम वह काम करें तो परमात्मा को पा सकते हैं। स्वामीजी महाराज फरमाते हैं कि अपने काम में फंसे रहो किसी अन्य काम में मत फँसो। हमें अपना भजन-सिमरन का जो कार्य मिला है वह करें और अपनी आत्मा को परमात्मा से मिलाएं। तो आइए, भजन सिमरन करें।

।।राधास्वामी।।

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