गुरू अर्जुन देव जी के अनसुने, अनपढ़े विचार: पढ़िये

Radha Soami- बाबा जी फरमाते हैं कि इस संसार में जितने भी संत-महात्मा आए हैं, जिनमे गुरु अर्जुन देव जी भी आयें, उन्होंने अपने अनुभवों के अनुसार इस संसार को रेखांकित किया है। जैसा भी देखा, वैसा ही उसका चित्र खींचा है। इसी तरह गुरु अर्जुन देव जी ने भी इस संसार को अनुभव करते हुए अपने वचनों में फरमाया है।

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करूँ विनती दोउ कर जोर

जीव कभी न पूरे होने वाले स्वपन देखता है।

गुरु अर्जुन देव जी का कथन है कि आध्यात्मिक रूप से और शारीरिक रूप से सारा संसार दुःखों, कष्टों में फंसा हुआ तड़प रहा है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकाररूपी डाकू उन लोगों की पूंजी लूट ली है और वे पागल हुए फिरते हैं। इन पांचों विकारों का विष प्रत्येक घर और प्रत्येक हृदय में फैल चुका है, कोई इससे बचा नहीं है।

लोग मानसिक और आध्यात्मिक पतन तपन तथा शारीरिक रोगों के बोझ से थक कर चूर हो चुके हैं। युवा व्यक्ति सुख-शांति के कभी भी पूरे न होने वाले स्वपन संजोता हुआ वृद्ध हो जाता है। सब तरफ दुख और अशांति है। जो वस्तुएं कभी प्राप्त नहीं हो सकती, उनकी प्राप्ति की अभिलाषा बनी रहती है। सचमुच यह ऐसी मृगतृष्णा है जो किसी को सदैव भर्म में रखती है।

धन-संपत्ति, स्वास्थ्य, यौवन, मान-बड़ाई, सब क्षणभंगुर है। पल दो पल विधुत के जैसी चमक दिखाकर, ये फिर जीवन को घोर अंधकार में छोड़ जाते हैं। इंद्रियों की भोगों ने संसार को विनाश के मार्ग पर डाल रखा है। ‘भोग से रोग और रोग से शोक’- जितना अधिक विषय-भोग, उतने ही अधिक लोग शारीरिक रोग तथा उनसे उत्पन्न होने वाले रोग।

राधास्वामी सत्संग ब्यास

पलभर की खुशी बन जाती है जीवन पर भारी

खुशी का पल भर का अनुभव, सत्ता का क्षणिक मद, काम का थोड़े समय का नशा, सब का अंत दुख, चिंता और पीड़ा है। कितने खेद की बात है कि सब कुछ जानते हुए भी लोग अंधों की तरह इनके पीछे भागते रहते हैं। उन्होंने सुख-शांति एवं मुक्ति के सच्चे स्त्रोत, नाम की ओर से मुंह मोड़ लिया है। जबकि केवल नाम ही जीव के दुःख व कलेश नष्ट करते परम आनंद की अवस्था में ले जा सकता है। परंतु जीव इन सबसे परे होकर के विषय भोगों के चक्कर में रहता है। उनको पल भर का ऐसो आराम पूरे जीवन को नष्ट कर देता है और सदैव भटकता रहता है। अत्यधिक दुख और कष्ट झेलता है।

गुरु अर्जुन देव जज

आओ, रूहानियत के रास्ते चलें।

गुरुजी के अनुसार हमें अपने ध्यान को रूहानियत रास्ते पर लगाना चाहिए। किसी पूर्ण संत सतगुरु की शरण में जाकर के उनसे हमें रूहानी के बारे में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं कि विषय विकारों को छोड़कर हमें नाम का सुमिरन करना चाहिए। हमें अपने असली कार्य पर ध्यान देना चाहिये। हमें भजन-सिमरन करना चाहिए और अपने परमधाम तक ना पहुंचे, जब तक अपने मन को एकाग्र रखते हुए भजन सम्मान करते रहना है।

।।राधास्वामी।।

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