चौरासी जेलखाने में भटकना छोड़ो, सतगुरु से नाता जोड़ो: बाबाजी

Radha Soami – आज तक जितने भी संत-महात्मा आए हैं। उन सब का एक ही मकसद था और एक ही मकसद है कि जितने भी जीव इस चौरासी के जेलखाने में भटक रहे हैं, उन सब को परमात्मा के घर पहुंचाना। इस दुख भरी दुनिया के चक्कर लगा-लगाकर आत्मा दुखी हो चुकी है तो संत-महात्मा उसके उद्धार के लिए, उसको परमात्मा से मिलाने के लिए बार-बार हमें समझाते रहते हैं। उदाहरण देते रहते हैं कि भाई किसी संत-सतगुरु की शरण में चले जाओ, औऱ उनसे ना ही युक्त प्राप्त कर लो।

Guru di bakshish

मनुष्य जन्म ही एक आखरी अवसर

सतगुरु बताते हैं कि मनुष्य जन्म ही एक आखरी अवसर है, जिसके द्वारा इससे चौरासी के जेलखाने से छुटकारा पाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर समझाते हैं की यह सीढी का आखरी डंडा है। मेहनत करेंगे तो हम छत पर चढ़ जाएंगे और अगर जरा सी लापरवाही की तो हम सीधे जमीन पर आ गिरेंगे और बहुत भारी पछतावा होगा। इसलिए संत समझाते हैं कि भाई गुरु की शरण में जाओ। उनसे नाम दान की युक्ति प्राप्त करो, भजन-सुमिरन करो और इस भवसागर से पार हो जाओ। क्योंकि तुम्हारे पास यही एक अंतिम अवसर है। मेहनत करोगे परमात्मा को प्राप्त कर लोगे नहीं तो बार-बार ऐसी चौरासी के जेलखाने में चक्कर लगाने पड़ेंगे।

संत बार-बार यह भी समझाते हैं कि भाई मनुष्य जन्म सभी योनियों से उत्तम है, क्योंकि मनुष्य योनि में ही पांच तत्व मौजूद हैं और किसी भी योनि में चार तत्व से ऊपर नहीं है। मनुष्य योनि में ही विवेक की शक्ति है। वह सोच सकता है कर भी सकता है और इस जन्म में मनुष्य जीव जन्म लेने के बाद वह कर्मों का भुगतान भी कर रहा है और अपने कर्म बना भी रहा है। बाकी सब योनियां तो केवल भुगतान करने के लिए ही आती है।

Radhasoami satsang beas

ये सब करने से खुश होते हैं सतगुरु

अगर हमें इस चौरासी के जेलखाने से छुटकारा पाना है तो सबसे पहले अपने आप से शुरुआत करो कि किसी का दिल ना दुखाया जाए। हमें चाहिए कि हम हर किसी व्यक्ति का जीव का आदर करें, सम्मान करें। कभी किसी जी को दुख ना पहुंचे यही नीति अपनाए रखना बहुत जरूरी है। हमें अपने व्यवहार में सहनशीलता, अनुशासन बनाना बहुत जरूरी है। इसके साथ हमें अपनी करनी में सेवा भावना रखना भी बहुत जरूरी है। क्योंकि बाबा जी फरमाते हैं कि सेवा से ही परमात्मा प्रश्न होते हैं, सेवा से ही सतगुरु प्रसन्न होते हैं, सेवा से ही मेवा मिलती है। यहां पर मेवा का अर्थ है कि हमें अपने जीवन में सुख और शांति प्राप्त होगी।

हमें अपने कार्य करने में आसानी प्राप्त होगी। इसलिए हमें हर किसी बड़े-बुजुर्ग, दिव्यांग, कमजोर, गरीब व्यक्ति की सेवा करनी चाहिए। उनकी सहायता करनी चाहिए। यह सब करने से हमारे मन में नम्रता आती है, मन झुकना सीखता है। मन एकाग्र होना सीखता है, मन एकाग्र होगा तो हमारा भजन-सुमिरन करने में आसानी होगी। हम अपने लक्ष्य के और अधिक नजदीक पहुंचेंगे।

तो आइए

हम इन सब बातों का फायदा उठाएं और गुरु जी की शरण में जाएं। नामदान प्राप्त करें, भजन-सुमिरन करें और अपने लक्ष्य को प्राप्त करें, परमात्मा को प्राप्त करें।

।।राधास्वामी।।

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