भजन-सुमिरन के साथ इन बातों का भी करें ध्यान, वरना हो सकता है नुक़सान।

Radha Soami- संत-महात्मा भजन-सुमिरन के बारे में समझाते हैं कि सत्संगी को सांसारिक सुखों का मोह नहीं रखना चाहिए। बल्कि जहां तक हो सके उसे इन से दूर ही रहना चाहिए। जब रोगी किसी डॉक्टर की दी औषधि का सेवन करता है, तो उसका बताया हुआ परहेज भी साथ-साथ करता है और उसके अन्य आदेशों का भी पालन करता है। इसी प्रकार सत्संगी को भी भजन-सुमिरन करने के साथ-साथ दूसरे आदेश का पालन भी करना चाहिए।

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जब फिर आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होता है

प्रारंभ में तो सांसारिक सुखों को और जगत की तड़क-भड़क का मोह उसे अपनी ओर आकर्षित करता है, परंतु वह उनसे बचने का प्रयत्न करता है। वह केवल जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएं ही स्वीकार करता है, शेष को त्याग देता है। फिर उसे आध्यात्मिक उन्नति में ऐसी अवस्था प्राप्त हो जाती है कि वह अंदर नाम से जुड़ जाता है और उसे आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होने लगता है।

बाबा गुरविंदर सिंह जी

संत फरमाते हैं ऐसी स्थिति में जगत के भोग व सब रस फीके और तुछ लगने लगते हैं और अभ्यासी इनकी और देखना भी नहीं चाहता। वह संसार से व्यवहार रखता है, परंतु इसके मोह में नहीं फँसता। वह केवल अभ्यास में लीन रहता है। भजन -सुमिरन में लगा रहता है। उसका मकसद केवल अभ्यास की तरफ अपनी लीव को लगाए रखना है।

नाम का वास्तविक महत्व हम तभी समझ सकते हैं, जब

संत फरमाते हैं नाम का वास्तविक महत्व हम तभी समझ सकते हैं, जब नौ द्वार खाली करके अंतर में नाम से जुड़ जाते हैं। बाबाजी फ़रमाते हैं कि सुपाच्य वैष्णव (शाकाहारी) भोजन करना चाहिए। यदि आपको कच्ची चीजें अच्छी लगती है और सुगमता से पच जाती है तो आप यह भी ले सकते हैं। जरूरी बात तो अपनी सुरत को समेटकर तीसरे से तिल में एकाग्र करना है। यह कार्य एक दिन में तो हो नहीं सकता। परंतु अभ्यास से हर काम सुगम हो जाता है। इसलिए भजन-सुमिरन बनाए रखें। भजन-सुमिरन से, नाम के अभ्यास से शुभ गुण स्वतः ही आ जाएंगे। इसलिए हुक्म अनुसार भजन-सुमिरन करें। परमात्मा को प्राप्त करें।

।।राधा स्वामी।।

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