बाबा गुरिंदर सिंह जी ने बतायी सुमिरन की शक्ति

Radha Soami – महाराज जी सत्संग में सुमिरन पर बहुत ज़ोर देते हैं। ध्यान का अर्थ है, अन्दर परमात्मा की खोज करना है और अपने अंदर यानी के तीसरे तिल पर ध्यान को एकत्रित करना, ध्यान को इकट्ठा करना, यही ध्यान का अर्थ है। जब तक हमारा ध्यान एक जगह नहीं टिकेगा। हम परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकते।

सूरत को बाहर के पदार्थों से हटाकर अंतर में लगाना ध्यान कहलाता है। प्रसन्नता की अनुभूति एकाग्रता का चिन्ह है, परंतु शरीर स्थिर होना चाहिए। सारा ध्यान और चेतन शक्ति का रुख तीसरे तिल की ओर होना चाहिए। जिससे हमारा ध्यान एकत्रित होता है। और हम परमात्मा के करीब पहुंच जाते हैं।

गुरिंदर सिंह जी

राधास्वामी जी

सिमरन करने वाला जीव खुद को कभी अकेला या असहाय अनुभव नहीं करता। क्योंकि अब उसके साथ परमात्मा खड़ा होता है। भजन-सिमरन बेकार कभी नहीं जाता। सत्य तो केवल यही है कि परमात्मा की उपस्थिति हमारे अपने अंदर ही है।

बहुत से जीवों के जीवन भर का सुमिरन काम नहीं आता या फिर शब्द नहीं खुलता। इससे उनमें अविश्वास, संदेह और निराशा घर कर जाती है, तो इसका कारण क्या है? जवाब यही है कि हमारी सिमरन की सामर्थ – हमारी काम वासनाओं, बिखरे हुए विचारों और अनेकों तरह के मानसिक तनावों के कारण कमजोर पड़ जाती है।

बाबाजी की प्यारी आवाज

सरदार बहादुर महाराज जगत सिंह जी

जगत सिंह महाराज जी फरमाते हैं की मैं आपकी कठिनाइयां समझता हूं। हर प्रकार के प्रश्न, हर प्रकार की समस्याएं सुमिरन के समय लाचार आत्मा के सामने खड़ी करना मन की आदत है। अपनी संकल्प शक्ति की सहायता से विघ्न डालने वाले सब विचार बाहर निकाल दें। चाहे आपको सफलता मिले या ना मिले। परंतु निरंतर ऐसा करने से आपका पथ धीरे-धीरे सरल होता जाएगा।

सुमिरन है और नीवं दृढ़ होनी चाहिए। सुमिरन से बहुत सहायता मिलती है, केवल आध्यात्मिक प्रयत्नों में ही नहीं, बल्कि सांसारिक कार्य-व्यवहार में भी नियमित रूप से सब विचारों को त्याग कर एकाग्र होकर सुमिरन करने से अपार लाभ होता है। यदि आपको प्रात:काल भजन के लिए समय न मिले तो किसी भी सुविधापूर्वक समय पर सुमिरन कर सकते हैं।

नकारात्मक नही सोचना ये आस्था और विश्वास के परीक्षण का

कभी-कभी सुमिरन करते-करते अचानक बहुत सारी नकारात्मक सोच आ जाती है, लगता है कि सब छोड़ दिया जाए। इतनी मेहनत के बाद भी कुछ अच्छा नहीं हो रहा,क्या फायदा इस साधना का ?

सतगुरु के प्याऱे जीवों चिंता मत करो, खुश हो जाओ क्योंकि जन्म-जन्म के संचित कर्म नष्ट हो रहे हैं। जो कष्ट बड़े रूप में होने थे वो सब छोटे रूप में ही बाहर आ रहे हैं और आपकी सुमिरन सफल हो रही है। यही समय है आपकी आस्था और विश्वास के परीक्षण का। सतगुरु पर विश्वास रखें।

।।राधास्वामी।।

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