आंतरिक मार्ग की खोज, यानि निजघर का दरवाजा

संत-महात्मा आपने हर सत्संगों में फ़रमाते है कि हमे परमात्मा से मिलना है तो सच्चे आन्तरिक मार्ग की खोज करनी पड़ेगी। जो बहुत जरूरी है। अगर हमें अपने घर के अंदर जाना है तो सबसे पहले घर के दरवाजे की तलाश करनी पड़ती है। निजघर का वह दरवाजा आँखों के पीछे तीसरी आँख, एक आँख या तीसरा तिल है।
भजन और सुमिरन के द्वारा
उसी को खोलने के लिये हम उसको खटखटाते हैं यानी बार -बार सिमरन और ध्यान के द्वारा अपने फैले हुए ख़याल को आँखों के पीछे इकट्ठा करते हैं। जब बार-बार खटखटाने से यानि सिमरन और ध्यान से हमारा ख़याल इकट्ठा हो जाता है, तब उस घर का दरवाजा खुल जाता है।फिर हमें घर जाने का रास्ता मिलता है।
फिर जब हम अपने ख़याल को वहाँ जाकर शब्द के साथ जोड़ते हैं, तो शब्द ला मार्ग खुल जाता है। उसके द्वारा हम वापस जाकर परमात्मा से मिलाप कर सकते हैं। बस थोड़ी मेहनत करनी है जो हमारे लिए बहुत जरूरी है।
तुलसी साहिब फ़रमाते हैं:-
कुदरती काबे की तू महराब में सुन ग़ौर से ।
आ रही धुर से सदा तेरे बुलाने के लिये।।
मुसलमान लोग हज यानि काबे की यात्रा करने से नजात प्राप्त कर सकते हैं। परंतु जो असली काबा है वह हमारा शरीर है। पैरों के तलवे से हमारा हज शुरू होता है और सिर की चोटी पर जाकर खत्म होता है। इस हज की दो मंजिले हैं :- एक आँखों के तक और दूसरी आँखों से ऊपर।
बाँग का महत्त्व
मौलवी हमेसा मेहराब के अन्दर खड़ा होकर बाँग देता है। हमारे माथे की बनावट भी मेहराब की तरह है। को मालिक की दरगाह की तरफ से क़ुदरती कलमा आ रहा है, वह इस मेहराब यानि माथे के अंदर आ रहा है। जब हम उस आवाज या कलमे को पढ़ते हैं ,तो हम उनके पीछे-पीछे चल कर अपनी मंजिले-मकसूद तक पंहुच जाते हैं। जहां से वह आवाज आ रही है।
इसलिए हमें भी भजन-सुमिरन के द्वारा का आवाज को सुनना है और अपने परमात्मा से जा मिलना है।
                 || राधास्वामी ||

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