प्रयास से ही प्रगति सम्भव है, हार ना मानें ।

महाराज सावन सिंह जी फ़रमाते है कि यह हरएक सत्संगी का धर्म है कि वह अपने मन को स्थिर करके तीसरे तिल में पहुँचे। गुरु का कर्तव्य सत्संगियों को इस मार्ग में मदद और रहनुमाई देना है। मन तथा इंद्रियों को क़ाबू करना और दसवीं गली में प्रवेश करना शिष्य की कोशिश पर निर्भर करता है। इस काम को पूरा करने में ख़ास बात अभ्यासी की कोशिश है।

महाराज सावन सिंह जी 
जिस पल हमें नाम दान की बख्शीश होती है हम पर भजन सुमिरन के लिए आवश्यक दया मेहर भी कर दी जाती है उसके बाद सब कुछ हमारी कोशिश पर निर्भर करता है कि हम उस दे मेहर का कितना फायदा उठा सकते है
जैसी कि बड़े महाराज जी ने ऊपर दिए उद्धरण में फरमाया है, हमें अपने प्रयास द्वारा मन को स्थिर कर के तीसरे तिल पर पहुंचाना है। यह काम हमारे लिए सतगुरु नहीं करेंगे। यह हमारा काम है। हमें हर रोज भजन-सिमरन करना है। हम अंदर तभी भी जा पाएंगे, जब हम भजन-सुमिरन के लिए बैठेंगे और अपनी तवज्जुह को तीसरे दिन पर एकाग्र करेंगे। यह काम केवल हम ही कर सकते हैं।
बिना नागा भजन करना
हमें हर रोज़ बिना नागा भजन-सुमिरन करना चाहिए। हमें हर रोज मन को एकाग्र करने का प्रयास करना चाहिए। प्रयास करने से ही हमें सफलता मिलेगी। धीरे-धीरे मन स्थिर होता जाएगा, तब जाकर हम कहीं फायदा उठा सकते हैं। हमें यह हर रोज प्रयास करते रहना हैं। भजन -सुमिरन पर लगे रहना है ताकि इस मनुष्य जन्म का लाभ उठा सकें और इस नाशवान संसार में दोबारा जन्म ना देना पड़े।
                || राधास्वामी ||

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