सत्संगों में से कुछ महत्वपूर्ण चुने हुये प्रेरणादायी वचन

Radha Soami- संत हमेशा अपने सत्संग में केवल उस परमपिता परमात्मा की प्राप्ति का रास्ता बताते हैं। वहां पर केवल नाम की युक्ति के बारे में समझाते हैं। बताते हैं कैसे?  उस परमपिता परमात्मा को पाए जा सकता है। आज हमने कुछ महत्वपूर्ण शब्द चुने हैं जो रूहानियत के बारे में हमें बहुत सी जानकारी देते हैं।
संत कहते हैं की सभी मनुष्य नामरूपी अनमोल रतन प्राप्त करने के लिए इस संसार में आते हैं। परंतु कोई विरले गुरमुख ही इस काम में सफल हो पाते हैं। जो नाम प्राप्त नहीं करते, उन्हें दोबारा जन्म लेना पड़ता है और माता के गर्भ में नौ माह तक उल्टे लटक कर घोर प्रायश्चित करना पड़ता है। उस समय आत्मा का ध्यान निरंतर तीसरे दिन में लगा रहता है और यही ध्यान उसकी रक्षा करता है। वह इस नरक से छुटकारा पाने के लिए प्रभु के चरणों में लगातार प्रार्थना करता रहता है कि अब जन्म मिलने पर वह प्रभु को एकदम याद रखेगा।

राधा स्वामी संत मार्ग

जन्म लेने के बाद परमात्मा को भूल जाता है मनुष्य

जब जीव का जन्म होता है तो सारे परिवार में प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है और सब उससे प्यार करते हैं। उसे चारों और सुंदर दृश्य तथा नए नए पदार्थ दिखाई देते हैं। जिन्हें देखकर वह माता के गर्भ में की गई प्रार्थना और प्रतिज्ञा भूल जाता है। इस प्रकार वह परमात्मा को पूरी तरह भूल जाता है। अतः अंत समय में संसार की कोई वस्तु उसका साथ नहीं देगी, फिर भी वह प्रभु को बुला रहे रहता है।
युवाअवस्था में तो वह धन संपत्ति तथा विषय वासना का पूरा दास बना रहता है और वह प्रभु का नाम जो उसे दुखों और बंधनों से मुक्त कराने वाला था, उसकी और वह ध्यान ही नहीं देता। वह प्रति क्षण माया के पीछे भागता है तथा थक जाता है और व्याकुल रहता है। इस प्रकार वह अनमोल जन्म यू ही गवा देता है। वह न शब्द धुन को पकड़ता है और नहीं मन को वश में करता है।

आपने असल को कभी ना भूले

वह मनुष्य जन्म के महान वह असली उद्देश्य को समझता ही नहीं। वह बूढ़ा हो जाता है और अंत में फसल काटने वाले मजदूरों की तरह यमदूत पकड़ कर उसे ले जाते हैं। किसी को पता नहीं चलता कि किस तरफ और कहाँ ले गए। जिन्हें अपना बनाने का यत्न करता रहा। जिसे अपना समझता रहा, उनमें से कुछ भी उसके साथ नहीं जाता तो यहां पर विचार करना पड़ रहा है कि हम पूरी उम्र क्यों व्यर्थ कर रहे।
हमने क्यों नहीं उस परमपिता परमात्मा की भक्ति की? क्यों नहीं हमने उस पूर्ण सतगुरु से नाम प्राप्त करके हमें उसे अपना बनाया?  व्यर्थ की माया प्राप्त करने के चक्कर में पड़े रहे और अपना मनुष्य जन्म को बेकार कर दिया। इसलिए हमें चाहिए कि जब भी समय मिले हमें उस परमपिता परमात्मा को याद करना है। उस नाम की युक्ति का सुमिरन करना है।

               
                          राधास्वामी

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